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आज का शब्द: मुरलीधर और रसखान की रचना- मानुष हौं तो वही रसखान

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- मुरलीधर, जिसका अर्थ है- मुरली धारण करनेवाले, श्रीकृष्ण। प्रस्तुत है रसखान की रचना- मानुष हौं तो वही रसखान 
                                                                 
                            

एक
मानुष हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो हरिछत्र पुरंदर धारन।
जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन।

भावार्थ:-  रसखान कहते हैं कि यदि मुझे आगामी जन्म में मनुष्य-योनि मिले तो मैं वही मनुष्य बनूँ जिसे ब्रज और गोकुल गाँव के ग्वालों के साथ रहने का अवसर मिले। आगामी जन्म पर मेरा कोई वश नहीं है, ईश्वर जैसी योनि चाहेगा, दे देगा, इसलिए यदि मुझे पशु-योनि मिले तो मेरा जन्म ब्रज या गोकुल में ही हो, ताकि मुझे नित्य नंद की गायों के मध्य विचरण करने का सौभाग्य प्राप्त हो सके। यदि मुझे पत्थर-योनि मिले तो मैं उसी पर्वत का एक भाग बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इंद्र का गर्व नष्ट करने के लिए अपने हाथ पर छाते की भाँति उठा लिया था। यदि मुझे पक्षी-योनि मिले, तो मैं ब्रज में ही जन्म पाऊँ ताकि मैं यमुना के तट पर खड़े हुए कदम्ब वृक्ष की डालियों में निवास कर सकूँ।

दो

या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सौं, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं॥


भावार्थ:-  द्वारिका में रह कर कृष्ण को ब्रज की याद आ रही है। वे व्यथित होकर रुक्मणी से कह रहे हैं कि उस लाठी और कामरी के लिए मैं तीनो लोक का राज्य एक दम छोड़ देने को तैयार हूँ, नंद की गाय चराने के लिए अणिमा आदि आठों सिद्धियों के तथा पद्म आदि नवों निधियों के सुख का त्याग करने को उद्यत हूँ। जब से मैंने अपनी इन आँखों से ब्रज के बन और तालाबों को देखा है अर्थात् मुझे उनकी याद आई है, तब से मैं उसके लिए इतना आतुर हो गया हूँ कि मैं वैभव के प्रतीक इन करोड़ों सोने-चाँदी के महलों को ब्रज के करील कुंजों के ऊपर न्यौछावर करता हूँ।

तीन
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी॥
भावतो वोहि मेरो रसखानि सों तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥


भावार्थ:- कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि! मैं मोर-मुकुट को अपने सिर के ऊपर पहनूँगी, गुंजों की माला गले में धारण करूँगी। पीला वस्त्र ओढ़कर और हाथ में लाठी लेकर तथा ग्वालिन बनकर जंगल-जंगल गायों के पीछे फिरूँगी। कृष्ण मेरा प्रिय है और उसे प्राप्त करने के लिए तेरे कहने से सारा स्वाँग भर लूँगी, किंतु कृष्ण की मुरली को, जो वे ओठों पर रक्खे रहते हैं, नीचे नहीं धरूँगी।

एक वर्ष पहले

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