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आज का शब्द: उपजाऊ और केदारनाथ अग्रवाल की कविता- चंद्र गहना से लौटती बेर

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- उपजाऊ, जिसका अर्थ है- जिसमें अच्छी उपज हो, उर्वर। प्रस्तुत है केदारनाथ अग्रवाल की कविता- चंद्र गहना से लौटती बेर
                                                                 
                            

देख आया चंद्र गहना। 
देखता हूँ दृश्य अब मैं 
मेड़ पर इस खेत की बैठा अकेला। 
एक बीते के बराबर 
यह हरा ठिंगना चना, 
बाँधे मुरैठा शीश पर 
छोटे गुलाबी फूल का, 
सज कर खड़ा है। 

पास ही मिल कर उगी है 
बीच में अलसी हठीली 
देह की पतली, कमर की है लचीली, 
नील फूले फूल को सिर पर चढ़ा कर 
कह रही है, जो छुए यह 
दूँ हृदय का दान उसको। 

और सरसों की न पूछो— 
हो गई सबसे सयानी, 
हाथ पीले कर लिए हैं, 
ब्याह-मंडप में पधारी; 
फाग गाता मास फागुन 
आ गया है आज जैसे। 
 

देखता हूँ मैं : स्वयंवर हो रहा है, 
प्रकृति का अनुराग-अंचल हिल रहा है 
इस विजन में, 
दूर व्यापारिक नगर से 
प्रेम की प्रिय भूमि उपजाऊ अधिक है। 
और पैरों के तले है एक पोखर, 
उठ रही इसमें लहरियाँ। 
नील तल में जो अभी है घास भूरी 
ले रही वह भी लहरियाँ। 
एक चाँदी का बड़ा-सा गोल खंभा 
आँख को है चकमकाता। 
हैं कई पत्थर किनारे 
पी रहे चुपचाप पानी, 
प्यास जाने कब बुझेगी! 

चुप खड़ा बगुला डुबाए टाँग जल में, 
देखते ही मीन चंचल 
ध्यान-निद्रा त्यागता है, 
चट दबा कर चोंच में 
नीचे गले के डालता है! 

एक काले माथ वाली चतुर चिड़िया 
श्वेत पंखों के झपाटे मार फ़ौरन 
टूट पड़ती है भरे जल के हृदय पर, 
एक उजली चटुल मछली 
चोंच पीली में दबा कर 
दूर उड़ती है गगन में! 
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2 वर्ष पहले

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