आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आज का शब्द: शुभ्र और पल्लवी मिश्रा- पश्चात्ताप के आँसू

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- शुभ्र, जिसका अर्थ है- सफेद, श्वेत, उजला। प्रस्तुत है पल्लवी मिश्रा की कविता- पश्चात्ताप के आँसू 
                                                                 
                            

सुना था
पश्चात्ताप के आँसू से
हर पाप धुल जाते हैं
बंजर जमीं पर गिरें ये बूँदें
तो फूल खिल जाते हैं
पर-
रोकर भी हमने देख लिया;
न पाप धुले,
न फूल खिले
बल्कि-
आँसुओं से धुलकर
गुनाह-
कुछ और चमक गए हैं।
पहले थे जो धुँधले-धुँधले
आईने की तरह
दमक गए हैं।
इस गुनाह के आईने में
जब भी देखा है
अपना अक्स
बड़ा डरावना-सा लगा है
जो चेहरा
भोला और मासूम था कभी
उस पर यह आवरण कैसा है?
इसकी हँसी,
इसका भोलापन
कौन छीन रहा है?
इक अजीब सूनेपन का जाल
निगाहों में
कौन बुन रहा है?
आँखों के स्निग्ध भाव को
किसने कसैला कर दिया है?
आत्मा की चादर
जो कभी थी
शुभ्र, उज्ज्वल, झकझक
उसे भी
मैला कर दिया है।
इसी मैल को
आँसुओं से
धोने की कोशिश कर रही हूँ
और यह सोच-सोच कर
डर रही हूँ
कि यदि यह मैल
छूट न पाया
तो-
इसके दाता को
कैसे इसे लौटाऊँगी?
चाँद के दाग को
भला मिटा पाया है कोई?
फिर आत्मा के मैल को
कैसे मिटाऊँगी?

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

4 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर