आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आज का शब्द: कुल और जयशंकर प्रसाद की कविता- बीती विभावरी जाग री!

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- कुल, जिसका अर्थ है- एक ही पूर्वपुरुष से उत्पन्न व्यक्तियों का समूह या वर्ग, वंश, घराना, जाति, समूह, समुदाय। प्रस्तुत है जयशंकर प्रसाद की कविता-  बीती विभावरी जाग री! 
                                                                 
                            

बीती विभावरी जाग री! 

अंबर पनघट में डुबो रही—तारा-घट उषा नागरी। 

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा, 
किसलय का अंचल डोल रहा, 

लो यह लतिका भी भर लाई—मधु मुकुल नवल रस गागरी। 

अधरों में राग अमंद पिए, 
अलकों में मलयज बंद किए— 

तू अब तक सोई है आली। आँखों में भरे विहाग री! 

2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर