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आज का शब्द: दृढ़प्रतिज्ञ और रामेश्वर नाथ मिश्र 'अनुरोध' की रचना- प्रात समय है सूर्यरश्मियाँ सतरंगी अतिसुन्दर

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- दृढ़प्रतिज्ञ, जिसका अर्थ है- अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने वाला। प्रस्तुत है रामेश्वर नाथ मिश्र 'अनुरोध' की रचना- प्रात समय है सूर्यरश्मियाँ सतरंगी अतिसुन्दर
                                                                 
                            

प्रात समय है सूर्यरश्मियाँ सतरंगी अतिसुन्दर
थिरक रही है पर्णकुटी पर अतिप्रसन्न हो आकर,
चमक रहा स्फटिक शैल-सा स्वच्छ नदी का तीर।
कलकल, छलछल कर लहराता प्रतिपल निर्मल नीर॥

महा विटप वत के नीचे है बनी वेदिका ऊँची।
गुग्गुल-अगरु-हवन-गंध से जो रहती है सींची॥
जहाँ सहज ही दिव्य सुगन्धित चलता मलय समीर।
दर्भासन को बिछा वहाँ पर बैठे हैं रघुबीर॥

जहाँ तलाबों के सरसिज के सुमन-अनूप खिले हैं।
जहाँ कुञ्ज की तरह परस्पर अगणित विटप मिले हैं॥
जहाँ गुलाब और केवड़ा के फूल खिले अनमोल।
जहाँ पपीहा-हंस-मोर के गुंजित हैं मृदु बोल॥

जहाँ भ्रमर विकसित प्रसून पर मंडराते रस पीते।
जहाँ विचरते निडर भयानक व्याघ्र, भेड़िये, चीते॥
वहीं प्रिया के संग राम बैठे हैं श्याम शरीर।
गूँज रही है मेघ सदृश उनकी वाणी गंभीर॥

" प्रिये! बता दो वन में रहते कितने दिन हैं बीते?
हम वनवासी बने श्रांत, माया-ममता से रीते॥
लेकिन कितनी शांति यहाँ है! कितना है संतोष।
यहाँ नहीं है भोग लालसा, नहीं किसी पर रोष॥

भोले-भोले ये वनवासी नित्य विविध फल लाते।
पहले हमें खिलते साग्रह तब अपने हैं खाते॥
कितने सरल और कोमल हैं गुह, निषाद औ' कोल।
कितने हैं निष्काम, अकलुषित इनके अटपट बोल॥

परम तपस्वी ऋषि-मुनियों का दर्शन हमको मिलता।
मन-तड़ाग में ज्ञान-भक्ति का सरसिज अनुपम खिलता॥
जग से एक विरक्ति भावना न जाने क्यों जागी?
सत्य कह रहा सबसे उत्तम हैं ये तपसी-त्यागी॥

" किन्तु देखती मैं तपियों का जीवन नहीं निरापद।
इनको भी पीड़ित करते हैं दुष्ट, तमीचर श्वापद॥
ये निस्पृह मानव-समाज के उन्नायक अविकार।
बने लक्ष्य आतंकवाद के सहते नित्य प्रहार॥

जिन्हें नहीं जग से कुछ लेना, केवल देना देना।
दृढ़प्रतिज्ञ अंधड़ में जिनको तपः तरी है खेना॥
ऐसे जो निर्भ्रांत मनस्वी औ' जो परम उदार।
उनको भी हैं दुष्ट सताते, कैसा जग व्यवहार! "
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3 वर्ष पहले

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