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विश्वनाथ त्रिपाठी को क्यों अच्छी लगती है उपेन्द्र कुमार की कविता – संविधान के बाहर एक बहस..

साहित्य
                
                                                         
                            समकालीन हिन्दी कविता की जब बात की जाती है तो बेशक कई सारे नाम सामने आते हैं, लेकिन जब एक अलग मिजाज की कविताएं और अपनी कविताओं में पौराणिक संदर्भों के साथ आज के दौर को जोड़ने और उन पर बेहद बारीकी से विश्लेषण करने वाले कवि की बात आती है तो इसमें एक अकेले कवि के तौर पर उपेन्द्र कुमार का नाम आता है। उपेन्द्र कुमार इसी 20 सितंबर को पचहत्तर साल के हो चुके हैं। उनके व्यक्तित्व और उनके काव्य संसार को जाने माने लेखक आलोचक और खुद 91 साल के हो चुके प्रो विश्वनाथ त्रिपाठी बेहद बारीकी से देखते हैं। उपेन्द्र कुमार पर अतुल सिन्हा के साथ बातचीत करते हुए त्रिपाठी जी ने उनके कई आयामों का विस्तार से विवेचन किया। उपेन्द्र कुमार की कविताएं भी पढ़ीं और उन पंक्तियों और पात्रों को बहुत बारीकी से देखा और परखा। इस बातचीत में उपेन्द्र कुमार के बहाने त्रिपाठी जी ने साहित्य के तमाम आयामों और दौर की चर्चा की है जो हमें उस दौर की कई शख्सियतों के बारे में विस्तार से बताती है। कबीर, प्रेमचंद औऱ परसाई तक के बारे में उन्होंने चर्चा की है।
                                                                 
                            

त्रिपाठी जी का मानना है कि उपेन्द्र कुमार ने अपने प्रबंध काव्य इंद्रधनुष में जिस तरह तीन पात्रों के जरिये मनुष्य के भीतर के महाभारत को पेश किया है वह अद्भुत है। खासकर ययाति जैसे चरित्र को चुनना अपने आप में उनकी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उपेन्द्र कुमार को अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ कवि बताते हुए त्रिपाठी जी उनकी कविताओं का ज़िक्र करते हैं। बताते हैं कि कैसे एक राजसी सामंती परिवार से जुड़े रहने और प्रशासनिक सेवा में रहने के बावजूद उपेन्द्र जी के भीतर उनका गांव धड़कता है और उनके गांव की नदी उसी तरह बहती है। कैसे उपेंद्र जी अपनी कविताओं में देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान या संसद को देखते हैं और कैसे उनकी कविता संविधान के बाहर एक बहस और कई सारे सवाल खड़े करती है। त्रिपाठी जी उनकी कविता काल अश्व का जिक्र करते हैं और काल की विकरालता के बारे में अपनी राय रखते हैं। त्रिपाठी जी उपेन्द्र कुमार पर बात करते करते कबीर, प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई तक की बात करते हैं। बेशक विश्वनाथ त्रिपाठी के साथ इस बातचीत का फलक बहुत बड़ा है और इसमें उपेन्द्र कुमार और उनके रचना संसार के बारे में समझने के साथ साथ हिन्दी रचनाकर्म के तीन कालों को भी बेहद बारीकी से समझा जा सकता है।

यह बातचीत आपके सामने हू ब हू बगैर किसी संपादन के पेश है। इसे आप यूं पढ़ें मानो आप खुद त्रिपाठी जी के सामने बैठकर उन्हें सुन रहे हों।

उपेन्द्र कुमार दशकों से साहित्य साधना कर रहे हैं। 75 वर्ष के होने जा रहे हैं तो सबसे पहले तो मैं उनको बधाई देना चाहता हूं और अपनी सराहना प्रेषित करना चाहता हूं उनके प्रति। बहुत दिनों से मेरा उनका परिचय है। जब परिचय हुआ व्यक्तिगत रूप से तो उससे पहले भी मैंने उनका नाम कवि ओर एक सहृदय साहित्य रसिक और सक्रिय साहित्य सर्जक के रूप में सुन रखा था। वो जिस विभाग में काम करते थे, उस विभाग में मेरे कई सीनियर छात्र काम करते थे। और मेरा ख्याल है कि वो ऐसा समय था जबकि सरकार के हर विभाग में सर्जक साहित्यकारों की एक टोली हुआ करती थी। वो आपस में परस्पर एक दूसरे के साथ साहित्य का आदान प्रदान भी करते थे, चर्चा भी करते थे, सत्संग भी करते थे। वातावरण सजीव बनाए रखते थे.. साहित्य और कलाओं का। उपेन्द्र कुमार जी को राउज एवेन्यू के पास सरकारी निवास मिला था। वहां वे हर होली के मौके पर साहित्यकारों को आमंत्रित करते थे। वहां उस समय जो होता है आमोद प्रमोद उल्लास वो भी होता था, उसके साथ जितना उचित है, मर्यादित ढंग से रस रंजन भी होता था। एक बार मैं भी वहां निमंत्रित हुआ तो मैं भी गया। वहां केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी जैसे बहुत सारे साहित्यकार रहे होंगे। उससे फिर मेरा उपेन्द्र कुमार जी से परिचय बढ़ा। उनके साहित्यिक रूप से जुड़े कवियों से भी मेरा परिचय हुआ। 

ये बहुत बाद में मुझे पता चला कि उनका संबंध बहुत बड़े सामंती परिवार से है और रिश्ते में वो काशी नरेश के कुल से जुड़े हैं। ये सुनकर भी मुझे अच्छा लगा क्योंकि मैं काशी विश्वविद्यालय का विद्यार्थी रहा हूं और काशी नरेश वहां के चांसलर हुआ करते थे। वहां के हिन्दी विभाग के जो अध्यक्ष थे आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, वो उन्हीं काशी नरेश के द्वारा संस्थापित थे। रामचरित मानस के संस्करण का संपादन आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने किया था और वो वहां अक्सर जाते थे.. काशी नरेश के नगर में। और उस संस्करण का उद्घाटन या लोकार्पण जो भी कहें, वो पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। तो ये मुझे बड़ा अच्छा लगा और एक रोमांच और रोमांस का भाव आ गया उनके साथ संबंधों में। इसलिए जब वो कुछ दिनों के बाद मदन कश्यप के साथ दिलशाद गार्डन के डियर पार्क में आए, जहां हमलोग इकट्ठा हुआ करते थे। उस समय दिलशाद गार्डन में अनेक साहित्यकार थे.. राकेश तिवारी, आलोक पुराणिक, विभांशु दिव्याल, विजय जी कहानीकार थे, शिवमूर्ति भी आते थे, राम कुमार तिवारी आते थे, हरिनारायण जी, रमेश आजाद, भारतेन्दु मिश्र, रमेश प्रजापति... बाद में उसमें जेके सिंह, कमलेश वगैरह भी इकट्ठे होते थे..बहुत लोग आते थे.. तो उपेन्द्र जी भी आने लगे। उतनी दूर से वो आते थे, उनके साथ एक ड्राइवर और उनका एक सेवक भी आता था। और वो समोसे बनवा कर लाते थे और अपने यहां से चाय बनवा कर भी लाते थे...गरमा गरम। उतनी अच्छी चाय और उतने अच्छे समोसे यहां दिल्ली में नहीं मिलते हैं। समोसे का कल्चर बनारस, इलाहाबाद यूपी, बिहार में है। उतने अच्छे समोसे दिल्ली में नहीं मिलते। वो उस तरह के समोसे लाते थे। चाय गरम होती थी. और अपने आप में असंभव को संभव करके दिखाते थे। इतना ध्यान रखते थे। गपबाजी होती थी। उनकी सज्जनता और सहृदयता का पता चलता था। और ये भी पता चला कि वो अच्छी और सही बात के लिए संघर्ष भी कर सकते थे और झगड़ा भी कर सकते हैं। एक बार कुछ प्रोपर्टी डीलर यहां उपद्रव करना चाहते थे, हमारा जो मंडल है उसके सदस्य के साथ मारपीट की नौबत आ गई तो मैंने देखा कि उपेन्द्र कुमार बिना किसी की परवाह किए हाथापाई करने को तैयार हो गए। तुरंत पुलिस को बुलाया। तो वो रूप मैंने देखा उपेन्द्र कुमार जी का कि जो सही बात के लिए जोखिम भी बहुत ले सकते हैं। उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष का मेरे ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा. तो इससे उनके साहित्य के प्रति भी मैं आकृष्ट हुआ।

मेरी अच्छी या बुरी आदत ये है कि मैंने जिन लोगों की कविताओं पर लिखा है, उनके जीवन के बारे में अगर मेरी अच्छी धारणा बनती है तभी मैं लिखता पढ़ता हूं। मैं साहित्य या साहित्यकार को उसके जीवन से अलग करके, उसके साहित्य की विवेचना कर ही नहीं सकता। परसाई को मैं बहुत दिनों से पढ़ा करता था। लेकिन जब मैं जबलपुर गया, परसाई को जब मैंने देखा तो बाप रे बाप.. मैंने देखा कि वो आदमी विकलांग बना कमरे में लेटा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर घर में काम करने वाला सफाई कर्मचारी तक से वह उसी भाव से सबसे मिलता है..और सबकी चिंता करता है वहां बैठकर।

फिर उनके व्यंग्य निबंधों को नए ढंग से पढ़ने लगा। और जब मैंने पढ़ा तो मुझे लगा कि ये छोटे छोटे निबंध नहीं ये तो महाकाव्य हैं। और मैं इन निष्कर्षों पर पहुंचा अतुल जी.. मैं चाहता हूं और इसकी घोषणा कर रहा हूं कि ये जो पूरा व्यंग्य निबंध हैं परसाई के ये तो देश की गाथा हैं।

मैं समझता हूं कि ये उपेन्द्र जी को भी अच्छा लगेगा कि उनके संदर्भ में बात करते करते परसाई की बात हो गई। देश के स्वतंत्रता-स्वाधीनता आंदोलन के समाज को देखना हो तो आप प्रेमचंद को पढ़िए..और स्वाधीनता आंदोलन के बाद के समाज को देखना है तो आप परसाई को पढ़िए।

हिन्दी में तीन व्यंग्यकार और रचनाकार हैं.. जो कुछ कह रहा हूं, पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं.. कबीर, प्रेमचंद और परसाई। बीच में भारतेंदु और निराला का नाम भी आता है, लेकिन मुख्य रूप से नहीं। और वो मेरे ख्याल से प्रेमचंद के बाद हिन्दी के सबसे बड़े गद्यकार परसाई थे।
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2 वर्ष पहले

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