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Ramcharitmanas: भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम

साहित्य
                
                                                         
                            वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।
                                                                 
                            
बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस॥

भावार्थ:-
हे पक्षिराज गरुड़जी ! वह शोभा, वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता। सरस्वतीजी, शेषजी और वेद निरंतर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस (आनंद) महादेवजी ही जानते हैं॥

भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।
बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम॥

भावार्थ:-
सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक को चले गए। तब भाटों का रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आए जहाँ श्री रामजी थे॥ आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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