मेरा सबसे पहला प्यार रेडियो है, दूसरा हिंदी और तीसरा सबसे निकटवर्ती महबूब थे वाहिद.. जो सबसे पहले बेवफा हो गए, छोड़कर चले गए न जाने किस देश। मैंने आकाशवाणी लखनऊ 5 साल की उम्र से सुनना शुरू किया ..उस समय उस समय 1 बजे देशगान में एक गीत गूंज उठता था 'इस देश का है मान व सम्मान तिरंगा' जिसे सुनकर रोम-रोम रोमांचित हो जाते तब मैं इतना छोटा था कि मुझे कविता के लय और भाव के अतिरिक्त कुछ न पता था, बड़ा हुआ तो पता चला ..इस देशगान के रचयिता ...वाहिद अली वाहिद हैं।
और तब से मैं देश इस कवि और देशभक्ति को एक पर्यायवाची मान बैठा और सच कहूं तो वाहिद साहब ने कभी निराश न होने दिया। उनके एक एक छंद में भारत बोध स्पष्ट परिलक्षित होता है, जिस युग में वे कविता के उच्च शिखर पर थे वो दौर मजहबी भिड़ंतों का दौर था, सम्प्रदायिकता चरम पर थी और जब ऐसा होता है तो किसी कबीर किसी रहीम या किसी रसखान को कलम को पतवार की तरह उठाना पड़ता है ताकि देश और समाज को साम्प्रदायिकता के मंझधार से निकाला जा सके, वाहिद उनमें से थे जिन्होंने न केवल वह पतवार थामी बल्कि उसके सबसे बड़े नाविक बने रहे उम्र के आखिरी क्षण तक।
मैंने रहीम ,रसखान और कबीर को सिर्फ पढ़ा और सुना था वाहिद को देखा है जाना है, गंगा जमुनी तहजीब का उनसे बेहतर संवाहक नहीं देखा ,उन्होंने बहुसंख्यक समाज और अल्पसंख्यक समाज को दो नदियों का प्रतिनिधि बना दिया,और एक संगम की खोज निरन्तर करते रहे, वो बेबाकी से कहते थे 'लेकिन गंगा की धारा में यमुना का सम्मान रहे' । जब 1961 में उनका जन्म हुआ और वो पले बढ़े ,तो देश तमाम बड़े युद्धों की विभीषिका झेल रहा था उस विभीषिका का समाधान उनकी कविता में ..बड़े ओज से निकला जब उन्होंने "तू भी है राणा का वंशज, फेंक जहां तक भाला जाए" लिखा तो यकायक यह कविता उनकी प्रतिनिधि रचना बन गयी, वाहिद की पहचान बन गई, लेकिन वाहिद जैसा संवेदनशील कवि सिर्फ युद्ध की बात नहीं करता, उन्होंने इसी कविता में आगे भी कुछ कहा जो दुनिया ने सुना ही नहीं और सुना तो बहुत कम सुना- तेरे मेरे मुँह पर ताला, राम करे ये ताला जाए, वाहिद के घर दीप जले तो, मन्दिर तक उजियाला जाए ।
वो खुद पर रसखान और रहीम जैसा बनने और होने का दारोमदार लेते भी थे और कहते थे "देश को जाति में बांट रहे, उनसे सद्भाव की आशा न होगी, रसखान रहीम के वारिस हैं ,हमसे कभी कोई निराशा न होगी"। वाहिद की कविता में टकराव से बचने और समाज को इससे बचाने की छटपटाहट साफ तौर दिखाई देती है, वो कहते हैं- जरा धीरे से टकराओ, मधुर संगीत निकलेगा, बहुत टकराओगे तो कोई बंधन टूट जाएगा, उन्हें प्रेम की उस बदली के बरसने का सदैव इंतज़ार रहा जिसके बरसने से हमारे दिलों में जमी वैमनस्यता गन्दगी धुल जाय और हम प्रेम और सौहार्द्र से भरे समाज की नींव डाल सकें, बदली बरसे जब राम गली, खुश होके चलें रमजान अली, रमजान अली नवरात्रि जगें, अफ्तार कराते हों रामबली, तब वाहिद बोलत मौलाअली,बजरंग बली बजरंग बली।
वाहिद ने जब वाहिद ने वाहिद के राम काव्य संग्रह लिखा तो एक राजनीतिक धड़ा बड़ा खुश और दूसरा नाखुश लेकिन वाहिद तो वाहिद थे उनकी बेबाकी कबीर से कम न थी, वो अंधेरे को अंधेरा कहने में शायद कभी हिचकिचाए हों ,नहीं तो कहते थे बाबा कबिरा कै बेटा, धारदार बोलबे जब बोलबे करेजवा निकार बोलबे। कबीर के इस बेटे ने राम भक्त होने के अपने दायित्व को संभालते हुए लिखा था- लगाने आग निकले हैं जो रघुवर की अयोध्या में, सियासी बंदरों को मैं भला हनुमान लिख दूँ क्या ?
वाहिद जीवन भर देश के रहे और उनके लिए देश कोई माटी का टुकड़ा नहीं बल्कि उसमें रचा बसा जनमानस था। उनके कुछ काव्य संग्रह हिंदी साहित्य की अतुल्य धरोहर बन चुके हैं, जैसे- औरत एक नदी है, वाहिद के राम, मौला अली बजरंगबली आओ नया कलाम लिखें। देश ललाम की चाह रखने वाला वाहिद आज जब यह दुनिया छोड़ गया तो रह रह कर मुझे उसके उसके संस्मरण याद आते हैं ,उस्ताद होकर भी शागिर्द को इतना मान देते थे कि याद कर आंखों में आंसू आ जाते हैं, कहते थे मुझे वाहिद भाई कहा करो अच्छा लगता है। साहित्य भले इस साहित्यकार का स्थानापन्न खोज ले मगर समाज इस अमर लोककवि को कभी भुला नहीं सकेगा ।
(अनुपम पाठक 'अनुपम' अवधी कवि व लेखक हैं)
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5 वर्ष पहले
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