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Buddha Purnima 2026: विध्वंस और विप्लव के बीच भारतीय दर्शन और चिन्तन एक विकल्प है

साहित्य
                
                                                         
                            आज दुनिया बारूद की ढेर पर बैठी है। चारों ओर विध्वंस और विप्लव की ज्वाला धधक रही है। जहाँ शांति दिख रही है, वहाँ भी भीतर-भीतर एक चिंगारी महसूस की जा सकती है। बड़े-बड़े देशों के कर्णधार ऊपर-ऊपर से शांति पाठ  करते दिखते तो हैं परन्तु अन्दर-अन्दर वे भी ‘सिकंदर’ बनने का सपना पाल बैठे हैं। वन-वनस्पतियाँ, पहाड़-पठार, झील-झरने, नदी-नाले, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी – सब सहमे हुए से धरती के विध्वंसमय भविष्य को देख रहे हैं और मनुष्य है कि प्रकृति के नैसर्गिक स्वरूप को तीव्र गति से क्षरित करता जा रहा है। ऐसी स्थिति में भारत एक विकल्प है- भारतीय दर्शन और चिन्तन दुनिया को रास्ता दिखा सकते हैं।
                                                                 
                            

हमारे प्रधान मंत्री बार-बार कहते हैं कि दुनिया ने युद्ध दिया तो हमने 'बुद्ध' दिया है। आखिर बुद्ध में ऐसा क्या है कि बार-बार हमें बुद्ध के  पास जाने की जरूरत महसूस हो रही है। आज से लगभग 2600 वर्ष पहले भारत की धरती पर एक महामानव ने जन्म लिया था, जिसने तत्कालीन जलती हुए धरती को शीतलता प्रदान की थी और आज भी उसके उपदेश दुनिया को ईर्ष्या, स्वार्थ और संघर्ष के ताप से मुक्ति दिला सकते हैं। ईसा पूर्व छठीं शताब्दी में लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल) में कपिलवस्तु की रानी महामाया देवी ने यात्रा के दौरान एक शिशु को जन्म दिया। राजा शुद्धोदन की संतान के रूप में सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु में 29 वर्ष बिताये। एक सुन्दर कन्या- यशोधरा से उनका विवाह हुआ और इनके ‘राहुल’ नामक एक संतान का जन्म हुआ। सिद्धार्थ की चेतना ऊर्ध्वमुखी थी।

कपिलवस्तु का राज, पत्नी यशोधरा का सौन्दर्य और राहुल का बालसुलभ आकर्षण भी उन्हें बाँध नहीं सका और वे एक दिन जगत की ज्वाला शांत करने के लिए 'महाभिनिष्क्रमण' कर गए। उन्होंने लगभग 6 वर्ष तप किया। उन्हें गया में निरंजना नदी के तर पर एक वटवृक्ष (बोधिवृक्ष) के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह ज्ञान ही 'बुद्धत्व’ (जाग्रत) है और यहीं से वे ‘बुद्ध’ कहलाये। बुद्ध ने मनुष्य मात्र के बीच समरसता, सत्य, न्याय और शांति का उपदेश देते हुए 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। बुद्ध का अपने प्रिय शिष्य आनन्द को दिया गया अंतिम उपदेश था- 'अत्त दीपो भव' (अपना दीप-प्रकाश स्तम्भ स्वयं बनो) उनके उपदेश त्रिपिटक (सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक) में संकलित किये गए हैं। आगे पढ़ें

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4 महीने पहले

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