क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को अंग्रेजों ने ऐतिहासिक 'काकोरी कांड' में मुकदमे के नाटक के बाद 19 दिसंबर, 1927 को गोरखपुर की जेल में फांसी पर चढ़ा दिया था। बिस्मिल के बलिदान की ख़बर बिजली की रफ़्तार से फैली, जन सैलाब उमड़ पड़ा और गोरखपुर के उस जेल के फाटक पर लोग इकठ्ठा हो गये जहां उन्हें फांसी दी गयी थी।
जेल का मुख्य द्वार बन्द ही था और फाँसीघर के सामने वाली दीवार को तोड़कर बिस्मिल का शव उनके परिजनों को सौंप दिया गया। डेढ़ लाख लोग शवयात्रा में शामिल हुए।शव यात्रा को शहर भर में घुमाया गया। उसके बाद राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर बिस्मिल का अन्तिम संस्कार किया गया।
बिस्मिल के बलिदान से आहत क्रांतिकारी भगतसिंह ने जनवरी 1928 के किरती (पंजाबी मासिक) में 'विद्रोही' छद्मनाम नाम से लिखे अपने लेख में इस बात का जिक्र किया कि- "फाँसी पर ले जाते समय आपने बड़े जोर से कहा - 'वन्दे मातरम! भारतमाता की जय!' और शान्ति से चलते हुए कहा - 'मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे, बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे; जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे, तेरा ही जिक्र और तेरी जुस्तजू रहे!'
फाँसी के तख्ते पर खड़े होकर आपने कहा - 'I wish the downfall of British Empire! अर्थात मैं ब्रिटिश साम्राज्य का पतन चाहता हूँ!' उसके पश्चात यह शेर कहा - 'अब न अह्ले-वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़, एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है!' फिर ईश्वर के आगे प्रार्थना की और एक मन्त्र पढ़ना शुरू किया। रस्सी खींची गयी। रामप्रसाद जी फाँसी पर लटक गये।"
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3 वर्ष पहले
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