आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कहानी: कभी-कभी हँसने वालियां

कहानी: कभी-कभी हँसने वालियां
                
                                                         
                            एक- यार धरा अभी तक नहीं आई।
                                                                 
                            
दो- बहुत भूख लग रही है यार
तीन- दो घंटे का बोलकर आई हूँ, पता पड़ा बिना खाए ही लौटना पड़ेगा।
चार- चिंकू को पड़ोसी के यहाँ छोड़कर आई थी कि फटाफट मिलेंगे और लौट आएँगे पर ये धरा लेट करवा रही है।

पुरानी सहेलियाँ उस दोपहर को लंच के लिए रेस्तरां में आई थीं। सबकी आवाज़ें एक-दूसरे को ओवर लैप कर रही थी। उनमें रीता,वर्षा, मीरा,कौमुदी, सुनयना और प्रिया थी लेकिन प्रिया उनकी बातों में शामिल नहीं थी। वह अपनी ही धुन में टेबल को तबले की तरह बजा रही थी। कौमुदी ने उसे टोका- ये क्या लड़कों की तरह टेबल बजाए जा रही है?
-टेबल बजाने में क्या लड़का और क्या लड़की...
- हम सब यहाँ धरा की बात कर रहे हैं और तेरा ध्यान ही नहीं है।
- वही मैं भी कह रही हूँ..तुम लोगों का मेरी ओर ध्यान ही नहीं है, तो मैं अपने आप ही आनंद ले रही हूँ।
-तेरी ओर ध्यान नहीं होता तो तुझसे बात करती क्या?
- यार तुम लोग ‘धरा नहीं आई, धरा नहीं आई’....की रट लगाए जा रही हो....जो आए हैं, वे अपनी बातें तो करें...धरा भी आ जाएगी तब तक...
इतना कहकर प्रिया ने एक लंबी साँस भरी और फिल्मी अंदाज़ में कहा- तुम लोगों के सामने मलिका बैठी है और तुम लोग उसकी ख़बर-ख़ैरियत ही नहीं पूछ रहे।
प्रिया ने कुछ ऊँचे लहज़े में यह बात कही थी और सबका ध्यान उसकी ओर चला गया था...मीरा ने चुहलबाजी करते हुए कहा- तो मैडम आप कहाँ की मलिका है?
प्रिया- हम अपने दिल की मलिका हैं।
कौमुदी- तो आपका शहज़ादा कहाँ है?
आगे पढ़ें

5 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर