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शमशेर की प्रेम कविताएं तो मशहूर हुईं ही, उनकी शायरी भी कम महत्वपूर्ण नहीं: राकेश मिश्र

शमशेर की प्रेम कविताएं तो मशहूर हुईं ही, उनकी शायरी भी कम महत्वपूर्ण नहीं... 
                
                                                         
                            'नई कविता' में मुक्तिबोध के साथ समान रूप से आदरणीय और चर्चित कवि शमशेर बहादुर सिंह की पहचान यूं तो एक समर्थ और महत्वपूर्ण कवि की है, लेकिन उनकी लिखी ग़ज़लें, रुबाइयाँ, क़ते और अशआर भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं । 
                                                                 
                            

शमशेर की शायरी का रंग, उसकी तड़प और उसकी अभिव्यक्ति दरअसल साझा संस्कृति में उनकी जबरदस्त आस्था से उपजी थी। हिंदी और उर्दू को लेकर जो राजनीति उस समय की जा रही थी, शमशेर उससे गहरे आहत थे। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘जो संस्कार मुझे अपने पूर्वजों से मिले, उनमें कम से कम उर्दू-हिंदी के बीच की दीवारें नहीं थी; बल्कि उनके बीच एक ऐसी जमीन थी जहाँ दोनों लगभग एक नज़र आती हैं। 

हिंदी और उर्दू के बीच चौड़ी की जा रही खाई को वे साम्राज्यवादी षड्यंत्र के तौर पर देखते थे। उन्होंने कहा, "इन दोनों के भेदभाव के पीछे राजनीति और जातीयता के स्वार्थों का और ग़ुलामी के ज़माने की शिक्षण नीति का इतिहास है। मैं इस इतिहास का कायल नहीं हूँ।" 

शमशेर अपनी रचनाओं पर बोलने में बहुत संकोची थे, और प्रकाशन को भी वे बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते थे, लेकिन अपनी ग़ज़लों को लेकर उनका बहुत ही स्पष्ट नज़रिया था, "मैं अपनी ग़ज़लों को अपनी हिंदी रचनाओं से कभी अलग नहीं रखना चाहूँगा।" ग़ज़ल एक लिरिक विधा है, जिसकी अपनी कुछ शर्तें हैं, अपना प्रतीकवाद है, अपनी जीवंत परंपरा है। 

ज़ाहिर है, अपनी इस जीवंत परंपरा को वो, मीर, ग़ालिब, दाग, ज़ौक़ से ही ग्रहण करते थे। अपनी कविताओं को स्पष्ट करने के क्रम में उन्होंने एक जगह ग़ालिब के एक शेर का हवाला भी दिया है, 
 
फरियाद की कोई लय नहीं है 
नाला पाबन्दे - नै नहीं है  
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3 वर्ष पहले

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