जिधर देखो, हर सिम्त ये बात चली है।
बड़ी देर,तेरी मेरी ये मुलाकात चली है।।
ग़म ना होता तो ये वक्त गुजरता कैसे।
बा-मुश्किल , रफ्ता-रफ्ता रात ढली है।।
लुत्फ़-ए-बज़्म उठाने वाले , क्या जाने।
किस हद तक तुझको तन्हाई खली है।।
-यूनुस खान
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