ख़ामोश हो गया है, वो शोर चिट्ठीयों का।
हो गया है ख़त्म सा,वो दौर चिट्ठियों का।।
हर सिम्त , उनको तलाश रहा हूं मैं अब।
क्यूं ठंडा पड़ गया है,वो दौर चिट्ठियों का।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X