हरे कर देती है जख़्म-ए-हिज़्र,तहरीर चिट्ठी की।
कितने ही राज़ छुपाये है , हर लकीर चिट्ठी की।।
तेरे हाथों से गुज़र कर, मेरे अश्कों में डूब गयी।
वाकई किस कदर बुलंद है, तकदीर चिट्ठी की।।
-यूनुस खान
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