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से गुजरा हूँ

                
                                                         
                            सुबह-ओ-शाम, मकतल के मैदान से गुजरा हूँ।
                                                                 
                            
जिंदगी मे रोज एक नये इम्तिहान से गुजरा हूँ।।

मां के दुपट्टे का शामियाना, मुझे याद आ गया।
इत्तेफाकन, मै जब घर के दालान से गुजरा हूँ।।

मुद्दतों पुरानी सब यादें, फिर से ताजा हो गयीं।
जब कभी भी फुर्सत मे इत्मिनान से गुजरा हूँ।।

पीपल की छांव और पनघट तब याद आ गये।
मै जब-जब, किसी वीरान मकान से गुजरा हूँ।।

हवा रूख के मुताबिक हों तो पता नही चलता।
पतवार याद आयी, मै जब तूफ़ान से गुजरा हूँ।।
-यूनुस खान
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2 महीने पहले

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