कुछ ना हो,कुछ गुफ्तगू-ओ-बात तो हो।
तेरे मेरे दरम्यां, अब यूं मुलाकात तो हो।।
रोक लूंगा तुम्हें अंधेरों का वास्ता देकर।
किसी तरह शाम ढले, और रात तो हो।।
किसी लंबे सफर पे निकल जायेंगे हम।
मेरे हमसफ़र, हाथों में तेरा हाथ तो हो।।
अश्क ग़म-ए-हिज़्र के धुल जायेंगे सारे।
आज बादल घिरें , और बरसात तो हो।।
मुद्दतों बाद मिले हो,अजनबी की तरह।
फिर से, एक वादा-ए-मुलाकात तो हो।।
-यूनुस खान
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