आज नही तो कल होगा।
जीवन या तो मरण होगा।
पर होगा रण संवाद।
होगा अब शंखनाद।
जन जन का यह प्रण होगा।
विनय नही अब निश्चय ही रण होगा।
पुरखे जो जोड़ दिए होते पाक अधिकृत काश्मीर को।
मातृभूमि की न माएँ रोती आज लाल के शीश को।
न घायल पड़ी वादियों की घाटी होती।
न रक्त से रंजित कश्मीर की माटी होती।
संयम की सारी सीमाएं लांघ चुके हैं हम।
अब एक के बदले दस सर होगा।
भारत के जन जन का यह प्रण होगा।
विनय नही अब निश्चय ही रण होगा।
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