आजादी की सुबह कुछ ऐसी थी...
हवा में रस घुला, माथे पर तिरंगा लगा ...
हंसते चेहरों में जैसे कोई अंतहीन ऊर्जा ....
कोई अपनी ही धुन में लगा तो कोई राष्ट्र की...
पर सुबह ...सुबह जैसी थी.....
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X