हवाओं में ज़हर घोली जा रही है,
किन हालातों में जियी जा रही है।
नज़रें भी किन से मिलाऊँ मैं यहाँ,
रोशनी भी धुँधली नज़र आ रही है।
पिया भी ज़हर मुख़्तसर सा ही मैंने,
अब ख़ुद ज़हर पिलायी जा रही है।
शहर से लौट भी जा सकता था मैं,
लौटने की आश में रही जा रही है।
क्या फ़र्क़ पड़ेगा मर जायेंगे हम तो,
एक दूसरे को बस लड़ाई जा रही है।
मोहब्बत का मज़हब होता है अख़्तर,
लव जेहाद पे बातें बढ़ाई जा रही है।
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