रोज़ तुम्हारी आरज़ू,
रोज़ तुम्हारी जुस्तजू
कितनी मुश्किल है हिज्र की ये घड़ी,
दिन महीनों में,
महीने सालों में बदलते जाते हैं।
सब्र छूटने को है, जान जाने को है,
या रब, इश्क़ में इतना न तड़पा,
इक झलक ही दिखला दे उनकी,
मेरी मोहब्बत-ए-रोज़ा इफ्तार फ़रमा,
कभी तो मेरी ज़िंदगी की ईद करवा...
- नीरू जैन
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