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ताल्लुक ही कुछ और है

                
                                                         
                            मैं उस शख्स से कभी मलाल नहीं रखूंगा,
                                                                 
                            
गुलाब रखूंगा पर उसकी डाल नहीं रखूंगा,
जो चले थे हम कुछ कदम कभी बाग-ए-जाध में,
अपनी जल्द-दमी भूलकर मैं तेरा अदब याद रखूंगा।

तेरी पेशानियों पर लकीर आये इसकी गुंजाइश न रखूंगा,
मोहब्बत दरमियान रखूंगा पर इसकी फरमाइश ना रखूंगा,
जो भी ताल्लुक है ये मुझसे तेरा, एतबार रख
इसका नाम ना रखूंगा पर बनाके पाक रखूंगा ।

तेरी खुद्दारी पर नाज़ रखूंगा, उसपर तेरा ज़माल न रखूंगा,
सब याद रखूंगा, तेरी याद के मुख्तलिफ और को न रखूंगा,
हमें शिकायत है कि हम एक दूसरे से अपनी बात क्यों नहीं करते,
इस बात को तराजू ना रखूंगा पर उम्मीद-ए-वस्ल रखूंगा।

मैं अब आंखों में कोई दूसरा ख्वाब ना रखूंगा,
आईनों पर भरोसा रखूंगा पर आईना ना रखूंगा,
मेरा मसला है कि एक दर का होकर दर दर नहीं जाता,
तुझे घर के आंगन में ना ला सका तो क्या दिल में रखूंगा ।

- विष्णु नेह 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

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