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अब भी मैं ज़रूरी हूँ

                
                                                         
                            कहते हैं, वक़्त गुज़र गया मेरा,
                                                                 
                            
पर मैं मुस्कुरा देता हूँ
क्योंकि वक्त तो उनका गुज़रता है,
जो ठहरना नहीं जानते।

ज़िन्दगी के इतने रंग देखे हैं मैंने,
कि अब हर रंग अपना लगता है।
किताबों में नहीं मिलते जो तजुर्बे,
वो ज़िन्दगी के रंगों में लिखे हैं

अब मैं हुक्म नहीं देता,
पर समझा देता हूँ।
अब मैं सलाह भी नहीं देता,
बस मुस्कुरा कर रास्ता दिखा देता हूँ।

घर के कोने में बैठा,मैं
अब “पुराना” नहीं
एक कहानी हूँ,
जो हर नए दिन को सिखाती है कि
जड़ों के बिना कोई शाख नहीं बढ़ती।

जो न सुने, उसे क्या शिकायत करूँ?
मैं तो अब अपनी धड़कनों से बात करता हूँ।
उनमें अब भी वही ताल है,
जो कभी ज़िन्दगी का सुर था।

मैं किसी कुर्सी, किसी पद, किसी हुक्म का नाम नहीं,
मैं अनुभव हूँ
मैं विरासत हूँ।
मैं अब भी ज़रूरी हूँ
उन सबके लिए,
जो अभी जीना सीख रहे हैं।
-वीरेन्द्र मेहता “आरव”
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 महीने पहले

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