एक गहरी, अनकही चीख है,
जो होठों की दरारों में जम गई,
उम्मीद की आख़िरी टिमटिमाती लौ,
हवा के स्पर्श से पहले ही थम गई।
जिस दर्द की कोई ज़बान नहीं,
वह सीने में अक्सर सुलगता है,
हंसती हुई आँखों के पीछे,
एक समंदर ख़ामोशी से पिघलता है।
हाथों से छूकर देखो तो,
वह पत्थर जैसा लगता है,
पर छू लो ज़रा एतबार से,
तो हर ज़ख़्म दोबारा जगता है।
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