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ए जीवन तुझसे रूठ गया हूं

                
                                                         
                            हवाओं के संग बह जाता हूं।
                                                                 
                            
संघर्ष तूफानों से कर जाता हूं।
बस हार हार कर जीत गया हूं,
ए जीवन तुझसे रूठ गया हूं।

राहें मंजिल पग पग जाता हूं,
ये शाम ढले तो घर आता हूं।
थकती नींदों में डूब गया हूं,
ए जीवन तुझसे रूठ गया हूं।

सेवा सेवा में यूं रम जाता हूं,
दुनिया जीवंत किए जाता हूं।
मैं धूप छांव में भीग गया हूं ,
ए जीवन तुझसे रूठ गया हूं।

जन जन में मुश्किल पाता हूं,
मैं देख गरीबी हिल जाता हूं।
जग की आहों में टूट गया हूं,
ए जीवन तुझसे रूठ गया हूं।
- विनय कुमार पाण्डेय "अजय"
 
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3 घंटे पहले

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