वफ़ाएं हज़ार निभाईं मैंने, पर तुमने सितम कहाँ कम किए,
ज़ख़्मों पे दवा भी न रखी, तुमने करम कहाँ कम किए।
गिले तो बहुत थे दिल में मगर, होंठों से कुछ भी कहा न गया,
तुम्हारी तरफ़ जो बढ़ते थे, वो क़दम कहाँ कम किए।
हर एक दर्द को सीने से लगाकर, हँसते-हँसते सह लिया,
चाहत में वफ़ादारों ने कभी, सनम कहाँ कम किए।
ये अलग बात है कि हमने ज़माने को मुस्कुराकर दिखाया,
ग़मों की अज़ीयत ने हम पर, अलम कहाँ कम किए।
तेरी बे-रुख़ी को देखकर भी, ये दिल तुझको ही चाहता रहा,
मोहब्बत में जो पाले थे हमने, वो वहम कहाँ कम किए।
— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X