दौरे-ज़िंदगी का सफ़र आसान कहाँ रहता है हरदम,
लोग खुद तो मशगूल रहते हैं, मगर राहों में काँटे बिखेर देते हैं।
जो मिलते हैं मुस्कुराकर, वही अक्सर दिलों को घेर देते हैं,
अपने मतलब की खातिर रिश्तों को पल में बिखेर देते हैं।
हम जिन्हें समझते हैं अपना, वही गैरों-सा बर्ताव करते हैं,
वक़्त पड़ने पर वही अपने हाथों से रिश्ते उखाड़ देते हैं।
कुछ लोग ख़ामोशी को हमारी कमजोरी समझ लेते हैं,
हम चुप क्या रहें, वो अपनी हदें पार कर देते हैं।
हमने तो हर मोड़ पर मोहब्बत से रास्ते सँवारे हैं,
लोग आते हैं और उन्हीं राहों में पत्थर बिखेर देते हैं।
किसी के दर्द का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं होता,
लोग हँसते चेहरे देखकर भी ज़ख्मों को कुरेद देते हैं।
विक्की, अब शिकवा भी करें तो किससे करें इस दौर में,
यहाँ लोग अपने ही हाथों से रिश्ते बनाकर, खुद ही उन्हें तोड़ देते हैं।
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