बेटा होने का दर्द भी कहाँ कम होता है,
एक बार खुशियाँ मनाते ही लोग जी भर के जिनके पैदाइश पे,
उनके जीवन का आगे का सफ़र भी कहाँ कुछ आसान होता है!
कट जाती है सारी उम्र जोड़ते-बटोरते,
आगे राहें जिंदगानी का सफ़र बड़ा कठिन होता है।
ख्वाहिशों को ताक पर रखकर,
अपने हर अरमान को घोट कर,
दूसरों की मुस्कान की खातिर,
अपना हर एक पल छोड़ कर...
रात की तन्हाइयों में जब थककर चूर होता है,
आँखों में समंदर लिए फिर भी वो मजबूर होता है।
दर्द अपना किसी से कह भी नहीं पाता वो,
क्योंकि कंधों पर अपनों की उम्मीदों का सुरूर होता है।
घर की नींव को मज़बूत करते-करते,
खुद एक दिन पत्थर सा बन जाता है,
कोई पूछे इस बेजुबान से कभी,
तो जाने कितने अनकहे ज़ख्म बताता है!
कौन कहता है कि फरिश्ते आसमानों में बसते हैं,
ज़मीन पर अपनों की खातिर जो हर रोज़ खुद को हैं घिसते।
उनकी खामोशी में ही छुपा होता है जहाँ सबका,
चुपचाप जलकर वो दीप, सबकी रातें रोशन करते हैं!
-विकास त्रिपाठी 'विक्की'
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