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वो अशेष था

                
                                                         
                            'भू' न थी
                                                                 
                            
न थी सुगंध
न जल ही था
न रस का ही संग
न तेज था
न रूप रंग
स्पर्शहीन सब
रहित वात विहंग
न शब्द था
न आकाश था
सब किंतु किसमें
लीन था

ये निहारिकाएं
नक्षत्र सूर्य तारे
ये धूम ग्रह
और पिंड सारे
लीन जिसमें
काल दिक
किसने बिखेरे
किसने समेटे

सत् न था
जब असत् न था
महत् न था
न हि भावाभाव था
न द्वंद्व
न क्रिया कोई
कारण न था
न गुण कोई

न काल था
तो कब वो था
जो दिशा नहीं
कहाँ वो था
अव्यक्त था
जो व्यक्त था
जो रिक्त से
विरक्त था
संज्ञा न थी
सत्ता न थी

जब था नहीं
कुछ शेष था
आरंभ था
वो अंत था
शून्य था
अनंत था
वो एक था
वो अशेष था
-विकास मोहन गुप्ता
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2 घंटे पहले

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