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ज्योतिबा

                
                                                         
                            ज्योतिबा
                                                                 
                            
धन्यवाद।
आप उसे
दहलीज के
बाहर ले आये,
क ख ग घ
त थ द ध
पढ़ाया
और
कितना बदलाव आया है ,
अब उसे
दस्तख़त के लिए
बायी अंगुली पर
स्याही लगानी नहीं पड़ती ,
अब वह स्वयं
लिख सकती है .........
मिटटी का तेल स्वयं पर
उंडेलने से पहले
( उसके पीछे रहनेवाले बच्चों को ध्यान में रखकर)
"मैं अपनी मर्जी से
जल कर ख़ाक हो रही हूँ"
- अशोक नायगांवकर
ज्येष्ठ मराठी कवि
हिंदी अनुवाद- विजय नगरकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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