बुझते-बुझते स्वयं ही...
झूठ बोलकर जीवन संवार लेते
आमंत्रण हमें भी मिल रहे थे
कि कुछ नहीं हुआ था, ये बात सही नहीं,
कितने सम्मोहक ऋतुएं मेरे घर से गुज़रीं,
शब्दों के नयन ने पलकें उठाकर देखा था
कि कुछ नहीं हुआ था, ये बात सही नहीं,
अपनी आत्मा का दीप बुझाते हुए
झूठ बोलकर जीवन संभालते
आमंत्रण ये भी मिले थे
कि कुछ नहीं हुआ था, ये बात सही नहीं,
प्रवचनकार ने अर्थ छुपाए, हम कीर्तन में झांझ बजाते रहे
अनेक लोग कहते थे कि जीवन का अनुवाद करें,
हर चौराहे पर ईमान बिक रहा था
अपनी बुद्धि गिरवी रखने वाले कम नहीं थे,
इसी बेईमानी के प्रकाश में एक दीप जलाए रखते हुए
बुझते जीवन को संवारा था,
कि कुछ नहीं हुआ था, ये बात सही नहीं
मूल मराठी कविता - नारायण सुर्वे
हिंदी अनुवाद - विजय नगरकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X