माना कि टूट चुके हैं वो,
संभालना चाहते हैं हम भी उन्हें।
देकर अपनी कसम,
जान की कीमत
उनसे जोड़ दिए...
वो है कि 'विभोर',
ख़फ़ा होकर हमसे
बात करना ही छोड़ दिए!
वो समझ बैठे हमें
हर एक जैसा,
हम नादान थे, समझाने जो लगे
उन्हें अपने जैसा!
कोई नहीं, समझ उनकी अपनी जगह रहेगी,
मंजूर होंगी उनकी सारी नादानियां,
गलतियां उनकी सारी माफ होती रहेंगी...
मगर...
ज़्यादा माफ करना भी
दिल को दुखाता है,
कमज़ोरी समझ वो हमारी
इसे इस्तेमाल करने लगे हैं!
-विभोर अग्रवाल
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