आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वंदनीय यह देश है..

                
                                                         
                            वंदनीय यह देश है,
                                                                 
                            
प्रभुता इसकी अलौकिक।
जागृत हो सब चले,
बेड़ियां अज्ञानता की तोड़ें।

कृषक भूमि की कथा यही,
सदा परिश्रम पूज्य रही।
कर्म धर्म की सुखाली प्रणाली,
ऋतुओं की है छटा निराली।

शुचिता सिंधु की लहरें उठती,
प्रेम निधि निज निर्झर बहती।
वन कानन के सुन्दर पंछी,
पपीहे की कूक लगती अच्छी।

मुक्त पवन की श्रृंखला अनंत,
बजते पल्लव के भी लय सुभग।
पुलकित प्रातः दौड़े तरुओं पर,
आत्मबल सजे सैन्य बाजुओं पर।

छूते गर्वीले उच्च गगन,
दृढ़ साहस के बढ़ते कदम।
आनंदमय हिमालय हिम बरसाता,
भारत को शिरोमणि यह बनाता।
 ---वंदना अग्रवाल ' निराली '
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर