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बोलती नहीं यह बाग बसंती

                
                                                         
                            बोलती नहीं यह बाग बसंती
                                                                 
                            
विरह वियोग से है अवनतमुखी।
भर मद - मधु कंचन नयनों में
प्यासी-प्यासी फिरती है बावरी।

गुदगुदाता वात जो इसको
मुक्ता से ओस बिखर पड़ते।
खोलते हैं पलक पावन बिंदु
निशि के प्रिय विरल इंदु।

छटती नहीं धुंध दृग द्वार से
मूंद ले आंखें विनम्र प्यार से।
निराकृत होगा अस्तित्व जब तेरा
स्मृति रेख खिंचेंगे केवल चितेरा।

धो डालेंगी सारी विपदा संताप
अश्रु गिर-गिर करेंगी दुलार।
उगेंगे पुष्प पुनः श्याम कपोलों पर
वेदनाओं के झंकृत अस्मित बेलों पर।

- वंदना अग्रवाल 'निराली'
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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3 वर्ष पहले

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