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गणपति — यूँ ही नहीं प्रथम पूज्य

                
                                                         
                            गणपति — यूँ ही नहीं प्रथम पूज्य
                                                                 
                            

बड़ा मस्तक यूँ ही नहीं है,
सोच को देता है विस्तार।
सीमाओं में क्यों मन बाँधें,
बड़े विचारों से हो उद्धार॥

छोटी आँखें कहती हमसे,
लक्ष्य सदा हो साफ़ दिखाई।
दुनिया चाहे ध्यान बँटाए,
दृष्टि न अपनी जाए भटकाई॥

कान तुम्हारे बड़े हैं बप्पा,
सुनने का देते वरदान।
बोलने वाले बहुत मिलेंगे,
सुनने वाला बने महान॥

सूँड तुम्हारी शक्ति अनोखी,
फूल उठाए, वृक्ष हिलाए।
सामर्थ्य वही श्रेष्ठ जगत में,
जो कोमलता साथ निभाए॥

एकदंत तुम कहते हमसे,
कौन यहाँ सम्पूर्ण हुआ?
टूटे हिस्से साथ लिए भी,
किसका जीवन व्यर्थ हुआ?॥

बड़ा उदर यह सीख सिखाता,
सुख-दुख दोनों साथ पचाओ।
जो अच्छा हो हृदय में रख लो,
कटुता मन से दूर बहाओ॥

छोटा मूषक साथ तुम्हारे,
मन की चंचल चाह बताए।
बुद्धि अगर लगाम सँभाले,
इच्छा सही दिशा में जाए॥

हाथ तुम्हारा वरद बना है,
मन को देता नया विश्वास।
दूजे हाथ का मीठा मोदक,
श्रम के फल का मधुर अहसास॥

विघ्नहर्ता कहते हैं तुमको,
विघ्न सभी तुम दूर हटाओ।
पर जीवन का मर्म यही है—
विघ्नों से लड़ना सिखलाओ॥

प्रथम तुम्हीं को पूजे जग जब,
इसमें गहरा ज्ञान समाया।
कर्म शुरू करने से पहले,
बुद्धि ने पथ सफल बनाया॥

माता गौरी के तुम लाडले,
शिव के आँगन की मुस्कान।
माता-पिता की परिक्रमा कर,
जग को दी रिश्तों की पहचान॥

फिर भादों की बेला आती,
महाराष्ट्र हर्षाता है।
घर-घर बप्पा जब आते हैं,
हर आँगन मुस्काता है॥

ढोल-ताशों की गूँज उठे तो,
भक्ति का सैलाब है छाता।
मोदक, आरती, दीपों के संग,
जन-जन बप्पा को अपनाता॥

कहीं कला है, कहीं है सेवा,
कहीं ज्ञान की ज्योत जलाई।
मंडप केवल पूजा-घर नहीं,
जन-सेवा की राह दिखाई॥

लोकमान्य ने इसी पर्व को,
जन-जन का अभियान बनाया।
घर की पूजा बाहर आई,
एकता का दीप जलाया॥

महाराष्ट्र से उठी जो गूँजें,
आज देश के मन तक आईं।
उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम,
बप्पा ने दूरियाँ मिटाईं॥

भाषा बदली, वेश भी बदले,
पर श्रद्धा का भाव समान।
जहाँ-जहाँ गणपति विराजे,
जुड़ता जाता हिंदुस्तान॥

दस दिन घर में साथ रहे जो,
उनकी जब आती विदाई।
हाथ जुड़े, पर आँखें भीगीं,
मन में फिर मिलने की आस समाई॥

जल में प्रतिमा धीरे उतरी,
माटी ने फिर माटी पाई।
रूप गया पर सीख न जाती,
यही विसर्जन की गहराई॥

बड़े विचारों वाला मस्तक,
सुनने का वरदान रहे।
दृष्टि सदा अपने लक्ष्य पर,
कर्मों में इंसान रहे॥

शक्ति मिले तो मन हो कोमल,
बुद्धि सदा आधार बने।
बप्पा केवल मूर्ति न रहें—
जीवन उनका संस्कार बने॥

अगले बरस फिर आना बप्पा,
कहना कितना आसान है।
तुम जो सीख सिखाकर जाते,
उस पर चलना सम्मान है॥

माटी का तन जल में उतरे,
मन में उनका ज्ञान रहे।
“गणपति बप्पा मोरया” केवल
नारा नहीं—जीवन का मान रहे॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
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एक घंटा पहले

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