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जल का प्रवाह भी रुक गया है।

                
                                                         
                            जैसे एक विशाल पत्थरों का पहाड़ टूटकर बिखर गया हो
                                                                 
                            

जैसे एक विशाल पत्थरों का पहाड़
टूटकर टुकड़ों में बिखर गया हो,
जैसे तूफ़ानी रात में
रातभर बारिश में भीगकर काँपता हुआ शरीर
अचानक ठंडा पड़ गया हो,
जैसे रेगिस्तान की मिट्टी पर
पानी की एक बूँद के अभाव में
किसी जीवन को फिर से जीवन न मिल पाए—
ठीक वैसी ही हालत हो गई थी उस दिन
मेरे हृदय की,
मेरे शरीर की
और मेरे मन की।

उस दिन के बाद,
इतने अधिक मानसिक दर्द के बावजूद
मैं जीवित रहूँगा,
कभी सोचा भी नहीं था!

मेरे हरे-भरे मन के
मैदानों में, घाटों में,
हवाओं में
कितनी रंग-बिरंगी रोशनी की किरणें थीं।

रोशन था मेरे मन का
धरातल, आकाश, जल, पहाड़ और वन,
जहाँ पशु-पक्षी
खुशी से खेला करते थे।

तुम चले गए!

और उसके बाद
अचानक मेरी ज़िंदगी में
सिर्फ़ अँधेरा उतर आया।

तब आकाश के तारे भी
जैसे अब टिमटिमाते नहीं,
हवा भी जैसे
अब बहती नहीं,
लगता है जैसे
जल का प्रवाह भी रुक गया है।

अब यह जीवन
जीवन जैसा लगता ही नहीं।

क्या बस वही एक गीत,
वही एक धुन
मेरे मन में,
मेरे प्राणों में,
मेरे हृदय में
बार-बार बजती रहती है?
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एक घंटा पहले

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