उल्फ़त में कभी जीत का दावा नहीं करते,
जिसे चाहें उसे दिल से जुदा नहीं करते।
वो सामने हो तो लफ़्ज़ों की ज़रूरत क्या है,
हम आँखों से भी अक्सर कोई शिकवा नहीं करते।
मोहब्बत की यही रीत हमें रास आई है,
जो अपना हो उसे दुनिया से रुसवा नहीं करते।
वो दूर है तो उसकी कमी महसूस होती है,
हम यादों को मगर दिल से ख़फ़ा नहीं करते।
कभी मिल जाए वो राहों में अचानक फिर से,
हम बीते हुए मौसम का गिला नहीं करते।
उल्फ़त अगर सच्ची हो तो दूरी भी कहाँ दूरी,
हम जिसको दिल में रखें, उससे फ़ासला नहीं करते।।
- राकेश कुमार तिवारी
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