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तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ

                
                                                         
                            तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ
                                                                 
                            

चल, तुझको मैं वो राह दिखाऊँ,
जहाँ मन पर कोई भार न हो,
जहाँ सच कहने से डर न लगे,
सपनों की कोई हार न हो।
जहाँ प्रेम ही मन की भाषा हो,
हर ओर नई-सी बहार हो—
तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ,
जहाँ जीना भी त्योहार हो॥

ऊँची उड़ानों की चाहत में,
कोई अपना पीछे छूट न जाए,
मंज़िल पाने की दौड़ कहीं,
इंसान को पीछे छोड़ न जाए।
तू जितनी चाहे उड़ानें भरना,
बस दिल में तेरा परिवार हो—
तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ,
जहाँ जीना भी त्योहार हो॥

चेहरों पर सच्ची मुस्कान रहे,
कोई झूठी पहचान न हो,
रिश्ते केवल कुछ नाम न हों,
हर रिश्ते में कुछ जान भी हो।
दिन चाहे दुनिया को दे देना,
कुछ साँझों में घर का प्यार हो—
तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ,
जहाँ जीना भी त्योहार हो॥

जीत किसी की हार न बने,
न धन से मन का मान मिले,
जो गिरते को फिर थाम सके,
बस उसको ही सम्मान मिले।
तू बड़ा बने, पर इतना बड़ा—
हर छोटे का सत्कार हो—
तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ,
जहाँ जीना भी त्योहार हो॥

धरती खुलकर साँस भी ले,
नदियों में निर्मल धार बहे,
पेड़ों की शीतल छाया में,
बचपन अपने गीत कहे।
न धुएँ में सूरज खो जाए,
हर मौसम खुशबूदार हो—
तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ,
जहाँ जीना भी त्योहार हो॥

हाथों में दुनिया हो लेकिन,
अपनों का हाथ न छूटे कभी,
परदे पर सौ मुस्कानें हों,
घर की मुस्कान न रूठे कभी।
साधन तेरे सेवक बनकर रहें,
उन पर तेरा अधिकार हो—
तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ,
जहाँ जीना भी त्योहार हो॥

मेरी आवाज़ साथ रहेगी,
जब राह अकेली हो जाएगी,
सीख मेरी दीपक बनकर तब,
अँधियारे में राह दिखाएगी।
तू सत्य चुने, तू प्रेम चुने,
चाहे मुश्किल हर बार हो—
तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ,
जहाँ जीना भी त्योहार हो॥

एक दिया तू, एक दिया मैं,
चल, मिलकर नई शुरुआत करें,
जो दुनिया हमको मिल न सकी,
उस दुनिया को आबाद करें।
हर मन में प्रेम का दीप जले,
फिर दूर कहाँ अँधियार हो—
तेरे लिए एक दुनिया बनाऊँ,
जहाँ जीना भी त्योहार हो॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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