शक्तिपीठों का उदय
यज्ञ सजा था दक्ष-भवन में,
देवों का सम्मान हुआ था,
एक निमंत्रण रोक दिया था—
शिव का ही अपमान हुआ था।
पुत्री के मन में उस क्षण ही,
पीड़ा एक अंगार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
पिता का आँगन सामने था,
फिर भी बेटी पराई थी,
शिव का आसन रिक्त पड़ा था,
सभा स्वयं शरमाई थी।
अपने दुख से बढ़कर पति की,
मर्यादा की पुकार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
अग्निकुंड था बीच सभा में,
सती खड़ी थीं मौन मगर,
शिव की निंदा कानों में थी,
कैसे रखतीं वही कलेवर?
योगाग्नि में तन त्याग दिया तो,
दक्ष-दंभ पर मार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
राख नहीं—एक देह पड़ी थी,
शिव की सारी दुनिया थी,
जिसे उठाकर कंधे पर वे,
भटक रहे—बस प्रिया वही थी।
शंकर के उस महाशोक से,
सृष्टि स्वयं लाचार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
डमरू मौन, त्रिशूल भी मौन था,
मौन हिमालय, मौन दिशाएँ,
शिव का रौद्र विरह देखकर,
काँप उठीं सारी सीमाएँ।
एक विरह जब प्रलय बना तो,
धरती भी हुंकार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
चक्र सुदर्शन विष्णु ने साधा,
सृष्टि बचाना धर्म बना था,
अंग-अंग जब अलग हुआ तो,
हर भूखंड ही तीर्थ बना था।
एक अकेली देह सती की,
जग की शक्ति-पुकार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
योनि-अंश नीलाचल पहुँचा,
कामाख्या का धाम बना,
सृजन स्वयं जिस शक्ति से उपजा,
उसका पावन नाम बना।
असम की उस पुण्य धरा पर,
माँ फिर से साकार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
जिह्वा गिरी हिमगिरि-अंचल में,
ज्वाला बनकर ज्योति जगी,
ज्वालामुखी में बिना प्रतिमा के,
अग्नि स्वयं आराध्य बनी।
पत्थर से भी आगे बढ़कर,
ज्योति वहाँ जयकार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
नयन जहाँ गिरने की गाथा,
नैना देवी नाम हुआ,
पर्वत की उस गोद में फिर,
माँ का पावन धाम हुआ।
दृष्टि जहाँ आराध्य बनी तो,
श्रद्धा ही उजियार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
नाभि गिरी उत्कल की धरती,
जाजपुर में बिरजा धाम,
जीवन-पोषण के उस केंद्र ने,
पाया माता बिरजा नाम।
माँ के एक पवित्र अंश से,
भूमि वहाँ श्रृंगार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
चरण-अंग कालीघाट पहुँचा,
कालिका का धाम बना,
कोलकाता की पुण्य धरा पर,
शक्ति का अनुपम नाम बना।
माँ के चरण जहाँ भी ठहरे,
माटी भी दरबार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
शीश-अंश हिंगलाज पहुँचा,
मरुभूमि ने शीश नवाया,
आज भले सीमाएँ बदलीं,
भक्ति ने कब भेद बनाया?
सीमाओं से ऊपर माता,
सबकी ही आधार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
कर्णाभूषण काशी पहुँचे,
विशालाक्षी रूप मिला,
विश्वनाथ की पावन नगरी,
मातृ-शक्ति से और खिला।
शिव की नगरी, शक्ति की नगरी—
एक दिव्य झंकार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
वाम भुजा बहुला में उतरी,
बंग-भूमि ने शीश धरा,
किरीट जहाँ किरीटेश्वरी में,
माँ का मुकुट पुकार उठा।
अंग-अंग से पूरब की धरती,
भक्ति का आगार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
वाम स्तन जालंधर पहुँचा,
त्रिपुरमालिनी पूजी गईं,
त्रिपुरा में चरण की गाथा,
सुंदरी बन घर-घर गईं।
उत्तर-पूर्व से पश्चिम-दक्षिण,
माँ की एक ही धार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
अट्टहास में अधर की गाथा,
कंकाली में कटि का मान,
कहीं कर, कहीं चरण, कहीं मुकुट,
कहीं नयन की रही पहचान।
नाम अनेक हुए माँ के पर,
शक्ति वही हर बार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
इक्यावन वे पावन पीठें,
इक्यावन स्मृति के स्थान,
कहीं अंग, आभूषण कहीं हैं,
कहीं सती की अमिट पहचान।
एक देह के बिखरे अंशों से,
भक्ति की मणिहार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
मंदिर बदले, नाम भी बदले,
भाषा बदली, देश बदलते,
कामाख्या से हिंगलाज तक,
फिर भी माँ के दीप न बुझते।
मानचित्र ने रेखा खींची,
आस्था कब दीवार हुई?
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
टुकड़े केवल तन के हुए थे,
शक्ति कहाँ टुकड़ों में बँटती?
ज्योति बाँटने से कब घटती—
दीप से दीपक बनती जाती।
एक सती के त्याग से आखिर,
धरती शक्तिधार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
दक्ष-यज्ञ से कथा चली थी,
पर यज्ञ वहीं समाप्त नहीं था,
जिसे जगत ने अंत समझा था,
वह शक्ति का अवसान नहीं था।
शिव के असह्य विरह से जन्मी,
माँ की जय-जयकार हुई—
देह बिखरी धरती पर,
शक्ति मगर विस्तार हुई॥
— संतोष कुमार शर्मा
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