सीमा पर सैनिक की दीवाली
दीप।
रंगोली।
मिठाई।
उजाला।
देश में
दीवाली थी।
सीमा पर
बर्फ थी।
सन्नाटा था।
और उस सन्नाटे में
एक सैनिक की आँखें
पूरे देश के लिए जाग रही थीं।
पीठ पर बंदूक।
पाँव में भारी जूते।
कंधों पर राष्ट्र का विश्वास।
सामने कँटीली तार—
और उस पार
अँधेरे में छिपी
अनजानी आहटें।
चौकी पर
एक छोटा-सा दीप जला।
उसकी लौ में
उसे अपना घर दिखाई दिया—
माँ का आँगन।
पिता की प्रतीक्षा।
पत्नी की मुसकान।
बच्चों की किलकारी।
मोबाइल निकला।
सिग्नल आया।
टूटा।
फिर जुड़ा।
स्क्रीन पर बेटी थी—
“पापा,
मेरी रंगोली देखो।”
चित्र रुक गया।
आवाज़ टूट गई—
लेकिन पिता का हृदय
हर अधूरा शब्द समझ गया।
बेटे ने पूछा,
“पापा, आप कब आओगे?”
वह कुछ पल मौन रहा।
फिर मुसकराया—
“जल्दी।”
सैनिक के शब्दकोश में
‘जल्दी’ की कोई तारीख़ नहीं होती—
यह केवल बच्चों की आँखों में
आशा बचाए रखने का वचन होता है।
कॉल कट गया।
स्क्रीन अँधेरी हुई।
आँखें नम हुईं।
फिर उसने मोबाइल रखा
और दूरबीन उठा ली।
घर से आया डिब्बा खुला।
माँ के हाथ के लड्डू।
पत्नी का पत्र।
बच्चों की बनाई तस्वीर।
तस्वीर में
वर्दी पहने पिता के नीचे लिखा था—
“हमारी दीवाली
आपके आने पर होगी।”
उसने तस्वीर
सीने से लगाई।
तभी आवाज़ आई—
“गश्त का समय हो गया।”
पत्र मुड़ा।
डिब्बा बंद हुआ।
मन सँभला।
और एक पिता
अपने बच्चों से दूर होकर
देश के बच्चों की नींद बचाने
अँधेरे में निकल पड़ा।
शहरों में
पटाखे फूट रहे थे।
सीमा पर
हर आवाज़ को
ख़तरे की तरह सुना जा रहा था।
वहाँ बच्चे
फुलझड़ियाँ गिन रहे थे।
यहाँ सैनिक
अँधेरे की आहटें गिन रहा था।
आधी रात
साथियों ने चाय बाँटी।
थोड़ी मिठाई।
कुछ हँसी।
बहुत सारी स्मृतियाँ।
किसी ने माँ को याद किया।
किसी ने पत्नी को।
किसी ने उस बच्चे को—
जिसने पहली बार ‘पापा’ कहा था,
पर पिता सुन नहीं पाया था।
सुबह हुई।
चौकी का दीप बुझ चुका था।
बर्फ पर जूतों के निशान थे।
तिरंगा अब भी
निर्भय लहरा रहा था।
देश ने कहा—
“दीवाली
शांति से बीत गई।”
किसी ने नहीं पूछा
उस शांति की कीमत किसने चुकाई।
हमने अपने घरों में
एक रात के लिए दीप जलाए थे—
वह पूरी रात
स्वयं अँधेरे में खड़ा रहा,
क्योंकि उसके हिस्से की दीवाली
किसी दीप में नहीं,
हमारे घरों की सुरक्षित रोशनी में जलती है।
— संतोष कुमार शर्मा
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