आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पेड़ का अंतिम बयान

                
                                                         
                            पेड़ का अंतिम बयान
                                                                 
                            

कुल्हाड़ी चलने से पहले
पेड़ ने कहा—

“ज़रा रुको,
मेरी एक बात
लिखते जाओ।

मैं अपराधी हूँ—
मैंने धूप रोकी,
राहगीरों को छाँव दी।

बिना किराया लिए
पक्षियों को घर दिया,
और भूखी चिड़ियों के लिए
फल बचाए।

मेरी डाल पर
किसी बच्चे ने
पहला झूला बाँधा था।

उसी डाल से
एक पिता ने
अपनी बेटी के लिए
गुड़िया बनाई थी।

मेरी छाल पर
दो नाम लिखे थे—
अब वे दोनों
एक-दूसरे को भूल चुके हैं।

पर उनके बीच बना दिल
आज भी
मेरे सीने पर है।

मैंने पत्थर खाकर
फल गिराए।

आँधियों से लड़कर
घोंसले बचाए।

टूटी डाल का
कभी शोक नहीं मनाया—
नई कोंपल उगाकर
फिर मुसकराया।

मैंने मिट्टी पकड़ी,
पानी रोका,
हवा सँवारी—

फिर भी
तुम्हारी फ़ाइल में
मेरा परिचय केवल
‘बाधा’ लिखा गया।

तुमने कहा—
सड़क चौड़ी करनी है।

मैं चुप रहा।

तुमने कहा—
नई इमारत बनेगी।

मैं चुप रहा।

तुमने कहा—
विकास के लिए
मेरा कटना ज़रूरी है।

तब पहली बार
मैंने पूछा—

“जिस विकास में
साँस लेने की जगह न बचे,
वह तुम्हें
कहाँ ले जाएगा?”

मेरे नीचे बैठकर
तुमने जंगल बचाने के
भाषण लिखे।

मेरी पत्तियों से
मंच सजाया,
फिर तालियों के बीच
मेरी नीलामी कर दी।

त्योहारों पर
मेरी पूजा की।

अगली सुबह
मेरी जड़ों पर
गरम तारकोल बिछा दिया।

चित्रों में
हरे रंग को सराहा,
धरती से
हरियाली मिटा दी।

तुम्हारे शहर में
नकली फूल खिले हैं,
काग़ज़ के पेड़ सजे हैं—

और असली पेड़
अपने जीवित होने का
सबूत माँग रहा है।

मुझे काटने वाले हाथों से
कोई शिकायत नहीं।

उन्हें घर चलाना है,
आदेश निभाना है।

मेरा प्रश्न तो
उन हस्ताक्षरों से है
जो ठंडे कमरों में बैठकर
मेरी मृत्यु तय करते हैं।

आज मुझे काट दोगे।

कल मेरी जगह
एक बोर्ड लगा देना—

“यहाँ कभी
एक पुराना पेड़ था।”

उसके नीचे
मेरी तस्वीर बनाना,
दो हरे पत्ते सजाना
और लिख देना—

“पेड़ बचाएँ,
जीवन बचाएँ।”

मेरी लकड़ी से
मेज़ भी बना सकते हो।

उसी मेज़ पर
वन बचाने की
नई योजना रखना।

काग़ज़ भी बनाना—

और उसी काग़ज़ पर
मेरी कमी से बढ़ती गर्मी का
आँकड़ा छाप देना।

मेरी अंतिम इच्छा?

बहुत छोटी है।

मेरे तने की उम्र
मत गिनना।

उन घोंसलों की संख्या गिनना
जो मेरे साथ उजड़ेंगे।

उन बच्चों से पूछना
जिनका झूला छूटेगा।

उस बूढ़े से पूछना
जिसकी दोपहर की छाँव
आज समाप्त होगी।

और यदि संभव हो—

मेरी जड़ों के पास
एक पौधा लगा देना।

तस्वीर के लिए नहीं,
उद्घाटन के लिए नहीं—

उसे सचमुच
बड़ा होने देना।

मैं मरकर भी
मिट्टी में नमी रखूँगा,
किसी कोंपल के लिए
अपनी जगह छोड़ जाऊँगा।

लेकिन याद रखना—

मेरे गिरने की आवाज़
कुछ पल ही सुनाई देगी।

मेरे बाद पसरा सन्नाटा
कई पीढ़ियों तक
तुम्हारा पीछा करेगा।

अब कुल्हाड़ी चला दो।

मैंने अपना बयान
पूरा कर दिया है—

दोषी मैं नहीं,
तुम्हारा विकास है।

आज कटघरे में
मैं खड़ा हूँ,

कल
मेरे बिना
पूरी मानवता खड़ी होगी॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर