जगत भी है पुकारता
भगत के जैसे लाल को ।
सुभाष जैसी बुद्धि
और खून के उबाल को ।
बिसमिल के जैसे त्याग को
और लाजपत सी ढाल को ।
मिट सके ना जो कभी
ऐसे ही इंक़लाब को
जो धर्म के ख़िलाफ़ हो
स्वीकार ना उस बात को
शीश ना ये झुकने पाए
चाहे उतार दो खाल को ।
कंधों के लेके चल रहा
जो ज़िंदगी के भार को
हो जागरूक जो चेतना
तो भार भी उतार दो ।
सिसक सिसक सिसक रहा
युवा क्यों है तड़प रहा
लहू रगो में चीखता
सिंह सी दहाड़ हो ।
जब भी बुरे हाल हो
जीवन का सवाल हो
हाथ में मशाल लेके
मिटा दो अंधकार को
वीर माँ के लाड़लो
सुनलो इस पुकार को ।
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