" ले चल हे मन मुझे... "
ले चल हे मन, मुझे उन गांव, उन गलियों में,
जहां सिंह के शावक के जैसे, वीरों के बच्चे खेलते हो,
खेल के गीतों में भी, जो 'वंदे मातरम' बोलते हो,
पिता की बलिदानी पर गर्व जिनके मन में हो,
दुश्मन को मार गिराने की, आग जिनके तन में हो,
मैं भी ऐसे वीर पुत्रों से मिलकर आऊंगा, ले चल मुझे, उन गांव, उन गलियों में !
ले चल हे मन, मुझे, उस घर की चौखट पर,
जहां मां अपने पुत्रों को देश हित लड़ना सिखाती हो,
स्वाभिमान पर मरने मिटने को, साहस का अमृत पिलाती हो,
नारी नहीं वह देवी है जो, देश हित अपनी ममता छिपाती हो,
मातृभूमि के लिए जो बेटों को, अमर शहीद बनाती हो,
मैं ऐसे चरण-कमलों को पूजूंगा- शीश झुकाऊंगा, ले चल मुझे उस घर की चौखट पर!
ले चल हे मन, मुझे, उन गहरी गहरी वादियों में,
देश के शहीदों की लाशे जहाँ बिछी होगी ,
शहीदों के लहू से, जहां की, धरा लाल रंगी होगी,
जहां, रज ने उनके पावन शरीर को ढक दिया होगा,
स्वर्ग जाने के लिए उनका, अंतिम संस्कार किया होगा,
उस रज को मैं, अपने माथे से लगाऊंगा, ले चल मुझे उन गहरी गहरी वादियों में !
ले चल हे मन, मुझे ,उन गिरि, उन पर्वतों पर,
जहां शहीदों ने अंतिम गोली खाई होगी,
जहां तरुओं और पवन ने, आंसू की बूंदे झलकाई होंगी,
जिन्हें देखकर, गगन के, पंछी भी रोए होंगे,
जिनकी बलिदानी पर, देवों ने भी, सुमन बरसाए होंगे,
उन पर्वतों के आगे मैं नत- मस्तक हो जाऊंगा, ले चल मुझे उन गिरि, उन पर्वतों पर!
-राजेश कुमार वर्मा
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