खाटू श्याम — हारकर भी जो हार न पाया
भीम वंश का रक्त था जिसमें,
घटोत्कच का स्वाभिमान।
माँ मौरवी ने सीख यही दी—
निर्बल का रखना सम्मान॥
तीन बाण की शक्ति मिली थी,
सामर्थ्य था उसका अपार।
फिर भी मन में वचन यही था—
निर्बल का बनना आधार॥
कृष्ण मिले तो प्रश्न यही था—
शक्ति बड़ी या धर्म महान?
उत्तर उसने शीश से लिखकर,
दे डाला अपना अभिमान॥
शीश गया, पर शौर्य न हारा,
देह गई, संकल्प रहा।
जिसने खुद को धर्म पर वारा,
उसका गौरव अमर रहा॥
जीत अगर सब कुछ होती तो,
राजमुकुट ही मान बढ़ाते।
त्याग न होता इतना ऊँचा,
श्याम के आगे शीश न झुकाते॥
नाम पुराना पीछे छूटा,
कृष्ण से अनुपम मान मिला।
बर्बरीक ने स्वयं को देकर,
‘श्याम’ नाम वरदान मिला॥
यही तुम्हारा जीवन-दर्शन—
पाना ही सम्मान नहीं।
कभी स्वयं को अर्पित करना,
पाने से भी कम दान नहीं॥
हारे का तुम साथ निभाते,
दुखियों को देते हो ठिकाना।
जिसने अपना सर्वस्व दिया हो,
वह जाने हर दर्द पुराना॥
मंदिर जाकर शीश झुकाना,
केवल इतना धर्म नहीं।
किसी गिरे का हाथ पकड़ना—
इससे सुंदर कर्म नहीं॥
शक्ति मिले तो साथ दो उसका,
जिसका कोई साथ नहीं।
श्याम तुम्हारी सीख यही है—
त्याग से ऊँची जीत नहीं॥
जीत उसी की केवल कब है,
जिसके सिर पर ताज सजाया?
जीत तो उसकी भी होती है—
जिसने अपना स्वार्थ मिटाया॥
शीश दिया, पर नाम अमर है,
युग ने जिसका मान बढ़ाया।
स्वयं मिटा, पर ‘श्याम’ हुआ जो—
हारकर भी वह हार न पाया॥
— संतोष कुमार शर्मा
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