कैसी ये आज़ादी है?
आज़ाद परिंदे की तरह,
आसमान में उड़ना चाहते हैं,
पर सड़कों पर बढ़ते जुर्म देख,
हम सहम-सहम कर जीते हैं।
कागज़ पर हर अधिकार मिला,
हर जुबां को बोलने का हक़ मिला,
पर सच कहने की कीमत यहाँ,
सांसों की आहुति बन कर मिला।
बोलने की आज़ादी तो है,
पर सच बोलें तो जान का खतरा है,
जहाँ हर सच बोलने वाले का,
रास्ता कांटों से भरा है।
ताज़ा ख़बरें जब-जब देखें,
दिल दहल-दहल सा जाता है,
इंसाफ माँगती आवाज़ों को,
खामोश बना दिया जाता है।
अपराधों के इस साए में,
कैसी यह आज़ादी की भोर है?
हर तरफ़ है डर का सन्नाटा,
और अन्यायों का शोर है।
हमें चाहिए आज़ादी अब,
हर खौफ और हर डर के साए से,
जहाँ सच को सच कहने का हक़ हो,
हर नागरिक को दिल और जान से।
-दीपिका रावल
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