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हिन्दी शीर्षक- मां की साडी

                
                                                         
                            माँ की साड़ी
                                                                 
                            
माँ की अलमारी का एक कोना,
आज भी मेरे बचपन का सबसे महकता हुआ ठिकाना है।
जहाँ रखी हैं तेरी वो रेशमी, सूती और बनारसी साड़ियाँ,
जिनके एक-एक धागे में सिमटा पूरा ज़माना है।
माँ, तेरी वो साड़ियाँ मुझे हर रोज़ तेरी याद दिलाती हैं,
तुझसे जुड़ी वो अनगिनत कहानियाँ सुनाती हैं।
आज भी जब अलमारी खोलती हूँ,
तेरी साड़ियों से तेरी ही महक आती है।
तेरी अनुपस्थिति में भी तेरे आँचल की गर्माहट,
उसी तरह हवा में तैरती नज़र आती है।
जब भी दिल भारी होता है, या तेरी याद तड़पाती है,
मैं अलमारी खोलकर घंटों बस तेरी साड़ियों को देखती रहती हूँ।
उन्हें बड़े प्यार से अपने हाथों में समेटती हूँ,
तेरी छुअन को उन कपड़ों पर ढूँढती हूँ।
पर सच कहूँ माँ... उन्हें पहनकर देखने की हिम्मत आज भी नहीं होती,
लगता है अगर पहन लिया, तो शायद तेरी सादगी का वो रूप मुझसे सँभल नहीं पाएगा।
उन साड़ियों का वज़न उठाना तो आसान है,
पर तेरी जगह खड़े होने की हिम्मत यह दिल आज भी जुटा नहीं पाता।
हाथ में उन सिलवटों को थामते ही,
बचपन से लेकर तेरे साथ बिताए हर पल की कहानी जीवंत हो जाती है।
याद आता है कैसे मैं बचपन में तेरे आँचल का कोना पकड़कर घूमती थी,
तेरी साड़ी के पल्लू से अपना मुँह पोछ लिया करती थी,
और तू बिना कुछ कहे बस मुस्कुरा दिया करती थी।
कभी जब तू थककर सोती थी, तो तेरी साड़ी ही मेरी ओढ़नी बन जाती थी,
वही गर्माहट, वही सुकून... जो दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलता।
कभी-कभी जब अकेलापन बहुत गहरा हो जाता है,
तो मैं तेरी उन्हीं साड़ियों से बातें कर लेती हूँ।
उन्हें अपने सीने से लगाकर हाल-ए-दिल सुनाती हूँ,
जैसे तू आज भी चुपचाप मुझे सुन रही हो,
और अपने पल्लू से मेरे आँसू पोंछ रही हो।
साड़ी की एक-एक तह जैसे तेरा कोई अनकहा ख़त हो,
जिसे मैं बार-बार पढ़ती हूँ और कभी थकती नहीं।
माँ, मुझे आज भी याद है तेरी वो पसंदीदा चुनरी की साड़ी...
कितनी अज़ीज़ थी वो तुझे!
तूने कभी किसी को उस चुनरी को हाथ भी नहीं लगाने दिया,
बड़े सहेजकर, प्यार से अलमारी के सबसे सुरक्षित कोने में रखा था।
तू कहती थी कि यह महज़ एक कपड़ा नहीं, तेरी खुशियों का रंग है।
आज तेरी उसी याद को सहेजते हुए,
मैंने तेरी तरफ़ से, तेरे आशीर्वाद के रूप में,
उस चुनरी की साड़ी को तेरी बहू के लिए अलग से संभालकर रखा है।
जब वो उसे पहनेगी, तो लगेगा कि तू ही उसे अपनी दुआओं का आँचल ओढ़ा रही है।
तेरे जाने के बाद भी तेरा वजूद कम नहीं हुआ,
तेरी साड़ियाँ तेरी मौजूदगी का एहसास बनकर मेरे साथ हैं।
ये साड़ियाँ सिर्फ़ कपड़े के थान नहीं,
तेरी ममता, तेरे त्याग, तेरी हँसी और तेरे स्पर्श की अमर निशानी हैं।
जब तक ये साड़ियाँ इस अलमारी में सजी रहेंगी,
तब तक इस घर के हर कोने में तेरी गर्माहट और तेरा प्यार महकता रहेगा।
-दीपीका रावल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 मिनट पहले

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