घर में सब ऑनलाइन हैं
दरवाज़ा खुला है,
मन बंद हैं।
स्क्रीनें जागी हैं,
संवाद मंद हैं।
एक ही छत है,
चार कमरे हैं,
चार सदस्य हैं—
और चार अलग दुनियाएँ हैं।
राउटर पर
चार हरी बत्तियाँ जलती हैं।
बत्तियाँ आपस में जुड़ी हैं,
घर के लोग नहीं।
माँ रसोई से लिखती है—
“खाना लग गया है।”
बेटा अगले कमरे से
अँगूठा भेज देता है।
थाली ठंडी हो जाती है,
इमोजी गरम रहता है।
भोजन पेट तक बाद में,
स्टेटस तक पहले जाता है।
स्वाद पर सब मौन हैं,
तस्वीर पर ‘वाह’ आता है।
पिता हर सुबह
फूल और सुविचार भेजते हैं।
संदेश के निशान नीले होते हैं,
पर उनके घुटनों का दर्द
किसी को दिखाई नहीं देता।
वे स्वास्थ्य के संदेश
सबको भेजते हैं—
अपनी जाँच की रिपोर्ट
अकेले पढ़ते हैं।
घर में सब ऑनलाइन हैं।
दादी की कोई डीपी नहीं,
कोई अनुयायी नहीं।
उनकी कथाओं में पूरा संसार है,
पर कोई लिंक नहीं।
वे एक ही कथा
बार-बार सुनाती हैं।
शायद उनकी स्मृति नहीं—
हमारे भीतर का श्रोता
कमज़ोर हो गया है।
पति-पत्नी
एक ही बिस्तर पर
दो संसार देखते हैं।
वीडियो बाँटते हैं,
अपनी बात नहीं।
कंधे पास हैं,
मन दूर।
नेटवर्क पूरा है,
रिश्ता अधूरा।
वह पूछती है—
“कुछ कहना था?”
वह स्क्रीन देखते हुए कहता है—
“नहीं, सब ठीक है।”
और यही
उनके बीच की सबसे बड़ी गड़बड़ी है।
घर में सब ऑनलाइन हैं।
बेटी की हँसी पर
सैकड़ों ‘लाइक’ हैं।
उसकी उदासी पर
घर में कोई टिप्पणी नहीं।
बेटा रातभर
दुनिया से बातें करता है।
सुबह पिता पूछते हैं—
“आजकल चुप क्यों रहता है?”
फोन चेहरा पहचानकर
तुरंत खुल जाता है।
अपने ही चेहरे का दर्द
परिवार से छिप जाता है।
वाई-फाई का पासवर्ड
सबको पता है।
माँ का डर, पिता की चिंता,
बच्चों की हार—
इनका पासवर्ड
किसी के पास नहीं।
जन्मदिन फोन याद रखता है,
शुभकामना भी वही सुझाता है।
तारीख़ सुरक्षित रहती है,
भाव कहीं खो जाता है।
नीले निशान बताते हैं—
संदेश पढ़ लिया गया।
मन का दर्द किसने पढ़ा,
उसका कोई निशान नहीं।
‘अंतिम बार देखा गया’
सबको दिखाई देता है।
माँ के पास अंतिम बार
कौन कब बैठा था—
यह कहीं दिखाई नहीं देता।
घर में सब ऑनलाइन हैं।
एक रात
बिजली चली जाती है।
राउटर की बत्तियाँ बुझती हैं,
स्क्रीनें अँधेरी होती हैं—
और पहली बार
चेहरे दिखाई देते हैं।
दादी मोमबत्ती जलाती हैं,
बेटी उनके पास बैठती है।
माँ गरम रोटियाँ लाती है,
पिता पुराना किस्सा सुनाते हैं।
बेटा पहली बार
बीच में टोके बिना
पूरा किस्सा सुनता है।
बीस मिनट में
घर फिर घर लगता है।
तभी बिजली लौटती है।
राउटर फिर जगमगाता है।
सबकी नज़र स्क्रीन की ओर उठती है,
दादी स्विच बंद कर देती हैं—
“दुनिया थोड़ी देर
ऑफलाइन रह लेगी।
आज उपकरणों को सोने दो,
आज रिश्तों को जागने दो।
बहुत दिनों से
घर में सब ऑनलाइन हैं—
आज पहली बार
घर को भी ऑनलाइन होने दो।”
— संतोष कुमार शर्मा
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