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चल साथी बढ़ साथी

                
                                                         
                            राह नई,
                                                                 
                            
चाह नई,
सोच नई,
भोर नई।
हिम्मत ही
राह बनाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

लक्ष्य बड़ा,
दल साथ खड़ा,
मन भी अड़ा,
हर डर से लड़ा।
एकता ही
शक्ति बढ़ाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

हाथ बढ़ाओ,
साथ निभाओ,
पीछे न कोई,
सबको मिलाओ।
साथ की ताकत
जीत दिलाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

सोच जगाओ,
राह बनाओ,
प्रश्न उठाओ,
हल खोज लाओ।
नई चुनौती
हुनर जगाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

गिरकर उठो,
फिर से जुटो,
दोषों से हटो,
हल पर डटो।
हर एक ठोकर
चाल सिखाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

मन खोलो,
सच बोलो,
सबकी सुनो,
फिर राह चुनो।
खुली हुई चर्चा
दूरी घटाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

काम भी करो,
दिल से करो,
श्रेय जो मिले,
सबको मिले।
साझी मेहनत
रंग दिखाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

समय बचाओ,
वचन निभाओ,
गुणवत्ता का
मान बढ़ाओ।
सच्ची निष्ठा
विश्वास बढ़ाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

नज़र उठाओ,
कदम बढ़ाओ,
डर को मिटाओ,
कल को सजाओ।
आज की मेहनत
कल मुस्काती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥

एक विचार,
एक आधार,
एक दिशा,
एक रफ़्तार।
साझी धड़कन
जोश जगाती—
चल साथी, बढ़ साथी,
मंज़िल हमें बुलाती॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
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एक घंटा पहले

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