आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

परिंदे, तुम उड़ जाना”

                
                                                         
                            तुम अगर ख़्वाब हो तो ख़्वाब में रह सकते हो,
                                                                 
                            
मेरी आँखों में कोई रात-सा ढल सकते हो।
हमने माना कि तुम्हें जाना है जाना ही सही,
मगर जाते हुए कुछ याद तो रख सकते हो।
मैंने हर मोड़ पे तेरा ही इंतज़ार किया,
तुम किसी मोड़ पे बनकर मेरी आहट सकते हो।
मेरे हिस्से में अगर दर्द ही आया है तो क्या,
तुम मेरे दर्द को इक नाम तो दे सकते हो।
हमने चाहा नहीं तुमको कभी बाँध के रखें,
तुम अगर चाहो तो आज़ाद भी रह सकते हो।
मैंने मिट्टी की तरह तुझको सँभाला था मगर,
तुम हवा हो तो मेरे हाथ से उड़ सकते हो।
जाने वालों की कमी शहर में रहती तो है,
तुम मगर दिल से कहाँ सच में निकल सकते हो।
थक गए हो तो मेरी छाँव में ठहर सकते हो,
दिल नहीं मान रहा तो आँख भर सकते हो।
मैंने रखी हैं तुम्हारे लिए कुछ बातें अभी,
तुम अगर चाहो तो ख़ामोश भी रह सकते हो।
जिस तरह शाम उतरती है किसी सूने घर में,
तुम मेरे बाद भी कुछ देर ठहर सकते हो।
रात आएगी तो तकिए पे तुम्हारी यादें,
मेरे सीने में कई शोर मचा सकती हैं।
बस मेरे हिस्से की थोड़ी-सी उदासी लेकर,
तुम किसी शाम मेरी याद में रो सकते हो।
और अगर फिर कभी मिलना न लिखा हो अपना,
तो मेरी याद को दिल से न मिटाना तुम—
मैं तो मिट्टी हूँ, बिखर जाऊँगा बारिश में कहीं,
तुम परिंदे हो... किसी और वतन जा सकते हो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर