अमृत से पहले हलाहल
दुर्वासा का दिव्य हार जब,
देवराज के सम्मुख आया था।
ऐरावत के शीश चढ़ाकर,
उसने ऋषि का मान घटाया था।
ऋषि के शाप से देवों का,
बल प्रतिदिन घटता जाता था।
श्री और वैभव दूर हुए तो,
स्वर्गलोक भी सूना लगता था।
अहंकार का एक क्षण आखिर,
घोर अनिष्ट बन सम्मुख आया।
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
हार सामने देख सुरों के,
मन में गहरी पीड़ा थी।
असुरों की बढ़ती शक्ति से,
स्वर्गभूमि भी भयभीत थी।
व्याकुल देव गए हरि-द्वारे,
अपनी व्यथा सुनाने को।
नारायण ने राह सुझाई,
खोया वैभव पाने को।
वैर भुलाकर साथ बढ़े तो,
साझे श्रम का पथ खुल पाया।
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
मंदराचल बना मथानी,
नाग वासुकी की डोरी थी।
देव-असुर दोनों छोरों पर,
मंथन की पूरी तैयारी थी।
पर्वत जब सागर में डूबा,
विष्णु कच्छप बन आए थे।
अपनी पीठ आधार बनाकर,
मंदराचल को बचाए थे।
दृढ़ आधार और साझा श्रम ने,
असंभव करके यह दिखलाया।
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
कालकूट की घोर ज्वाल ने,
तीनों लोकों को घेरा था।
रत्नों की अभिलाषा टूटी,
चारों ओर विषैला फेरा था।
दिशा-दिशा में ताप बढ़ा तो,
हर प्राणी घबराया था।
देव-असुर सब दूर हटे तो,
जग पर संकट छाया था।
सुख की चाह से पहले जीवन,
दुःख ने सबको आज़माया।
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
कैलाशपति ने जब सुनी थी,
त्राहि-त्राहि की करुण पुकार।
जगत बचाने हेतु बढ़े तब,
करुणामय शिव हुए तैयार।
अंजलि में हलाहल लेकर,
महादेव ने पान किया।
पार्वती ने कंठ थामकर,
विष को वहीं विराम दिया।
परहित में जिसने गरल पिया,
नीलकंठ वह जग में कहलाया।
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
चंद्र, कौस्तुभ, कामधेनु संग,
दिव्य रत्न जब आने लगे।
कल्पवृक्ष और श्वेत ऐरावत,
सिंधु-गर्भ से आने लगे।
महालक्ष्मी प्रकट हुईं तो,
जग में मंगल छाया था।
वरमाला लेकर श्रीहरि को,
उन्होंने वर अपनाया था।
धैर्य नहीं जिसने छोड़ा था,
उसने मंगल-फल भी पाया।
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
अमृत-कलश लिए धन्वंतरि,
सागर-मध्य से आए थे।
दिव्य सुधा को देख सभी दल,
अपने हाथ बढ़ाए थे।
कलश छीनने की इच्छा ने,
नव संघर्ष खड़ा कर दिया।
मोहिनी बन विष्णु ने आकर,
धर्म-पक्ष को अमृत दिया।
केवल बल से नहीं, विवेक ने,
सृष्टि-धर्म को फिर बचाया।
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
छल का वेश पहनकर राहु,
देवों के मध्य जा पैठा था।
अमृत पाने की लालसा में,
कपट हृदय में जा बैठा था।
सूर्य-चंद्र ने भेद बताया,
हरि ने चक्र चला दिया।
अमृत कंठ उतरने से पहले,
शीश धड़ से अलग किया।
छल से पाया अमृत भी कब,
जीवन में शुभ फल दे पाया?
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
मन-सागर में आशा-संशय,
नित्य नया मंथन करते हैं।
सुख पाने की अभिलाषा में,
कितने विष हम सहते हैं।
पीड़ा, बाधा और निराशा,
पहले पथ में आती हैं।
जो शिव जैसा धैर्य सँभालें,
मंज़िल उनको मिल जाती है।
विष से डरकर रुका मनुज कब,
जीवन-अमृत को पा पाया?
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
घर हो, संस्था, राष्ट्र अथवा जग,
साथ सभी का लेना है।
भिन्न विचारों के बीच लक्ष्य का,
दीप निरंतर रखना है।
शिव-संयम को कंठ बसाकर,
विष वाणी तक आने न दो।
प्रेम-सुधा संसार में बाँटो,
मन में द्वेष समाने न दो।
साझे श्रम और त्याग ने मिलकर,
हर युग को अमृत दिलवाया।
नीलकंठ ने विष थामा तब,
क्षीर-सिंधु से अमृत आया॥
— संतोष कुमार शर्मा
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